दलबदल कानून मजाक बन गया है
भारत में दलबदल कानून पर नए सिरे से विचार की जरुरत है। 1985 में बने और उसके बाद कई बार संशोधित और अदालती आदेशों से परिमार्जित हुए इस कानून के रहते जिस तरह से विधायक और सांसद पार्टी बदल रहे हैं उससे तो लग रहा है कि यह कानून पूरी तरह से बेअसर है। इसलिए या तो इसे समाप्त कर देना चाहिए और 1985 से पहले वाली व्यवस्था बहाल कर देनी चाहिए या फिर कानून को नए सिरे से परिभाषित करके उसे ऐसा रूप देना चाहिए कि सचमुच विधायकों और सांसदों को पार्टी बदलने या पार्टी तोड़ने से रोका जा...