अग्निपथ में भारत!

भभकता भारत। धधकता भारत! गर्माता भारत। झुलसता भारत। गर्मियां निकालता भारत। गर्मियां बुझाता भारत। माचिसें बांटता भारत। तिलियां जलाता भारत। अग्निपथ बनाता भारत।

माचिस में अभी बहुत तिलियां!

भारत की हिंदू सत्ता की माचिस में तिलियां बहुत बाकी हैं। एक के बाद एक अग्निपथ बनने हैं। चिंता का ताजा मामला सेना का है।

मनमानियों से बनता ‘अग्निपथ’

बुनियादी रूप से इस योजना का नाम ‘टूर ऑफ ड्यूटी’ है, जिसे दूसरे विश्व युद्ध के समय दुनिया के कई देशों में आजमाया गया था।

बुलडोजर का इंजन चलता रहेगा

उत्तर प्रदेश सरकार बुलडोजर का चुनिंदा इस्तेमाल कर रही है। उत्तर प्रदेश की देखा-देखी राजधानी दिल्ली में भी बुलडोजर से न्याय किया गया और मध्य प्रदेश में भी इसका प्रयास हुआ है।

पक्ष-विपक्ष की लड़ाई भी ठंडी नहीं होगी

कांग्रेस इस बात को समझ रही है। इसलिए तय मानें कि कांग्रेस और केंद्र सरकार व भारतीय जनता पार्टी का टकराव भी स्थायी हो गया है।

भारत बदल गया!

नरेंद्र मोदी, भाजपा सरकार और संघ परिवार सचमुच कामयाब है। भारत का जन-जन नई दिमागी अवस्था में है। धर्म ने दिमाग में बाकी सभी चीजों की सफाई कर दी है।

मीडिया के बदलने से सब बदला

इंसान के बदलने की शुरुआत मीडिया के बदलने से हुई। मीडिया का काम विमर्श को आगे बढ़ाना और जनभावना का निर्माण करना है।

कितना बदल गया इंसान

लोगों को समझा दिया गया है कि गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार आदि कोई समस्या नहीं है। असली समस्या धर्म की है।

मीडिया का ऐसा बदलना कैसे?

ऐसा लग रहा है कि भारतीय मीडिया के मालिक और पत्रकार दोनों इस समय के इंतजार में बैठे थे कि कब मौका मिले कि हिंदू धर्म का गौरव स्थापित करने के लिए काम शुरू करें।

सबका सार मार्केटिंग

वक्त यह अनुभव कराता हुआ हे कि यथा राजा तथा प्रजा और यथा प्रजा तथा राजा की केमिस्ट्री में हिंदू समाज का दिखावा और प्रायोजन फैलते हुए हैं।

शर्मनाक यह जो सब बेमतलब!

एक प्रधानमंत्री, उनका एक चेहरा, उनके भाषण, उनके प्रोपेगेंडा, प्रायोजित मीडिया के शोर में पूरा देश ऐसा डूबा है, जिससे बाकी सब कुछ सोख गया है।

सांसद, राष्ट्रपति, मंत्री, राज्यपाल किसका क्या मतलब?

एक वक्त था जब राष्ट्रपति, सांसद, स्पीकर, राज्यपाल, कैबिनेट मंत्रियों के चेहरों से पद की आभा बनती  थी।

सांसद बन कर भी क्या करेंगे?

इन दिनों देश की राजनीति राज्यसभा के चुनाव में उलझी है। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी इस चिंता में है कि कहीं उसके सांसदों की संख्या एक सौ से कम नहीं हो जाए।

पीएमओ है या सीएमओ

अब सिर्फ दो संस्थाओं की प्रासंगिकता है। केंद्र में प्रधानमंत्री कार्यालय और राज्यों में मुख्यमंत्री कार्यालय।

लोक सेवकों के चयन का इतना हल्ला क्यों

राज्यसभा चुनाव के अलावा जिस बात की इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा है वह लोक सेवकों का चयन है। संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी के जरिए अखिल भारतीय सेवाओं के 685 अधिकारियों का चयन हुआ है।

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