‘जनसत्ता’ की दुपहरी, बहुत छोटी!

मैंने जून 1995 में ‘जनसत्ता’ वैसे ही छोड़ा जैसे जैसे जेएनयू और टाइम्स समूह को 1978-79 में छोड़ा था। मुड़ कर फिर कभी ‘जनसत्ता’ की ओर देखा ही नहीं।

नौकरी शुरू नहीं की और मैं ट्रेड यूनियनिस्ट!

‘जनसत्ता’ में मेरी नौकरी की शुरुआत सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने वाली थी। अखबार लांच होने से पहले ही नौकरी खतरे में।

और प्रभाष जोशी का संसर्ग

हमें ज्यादा नहीं खपना पड़ा। कंप्यूटरकृत नई कंपोजिंग व उससे लेआउट में आसानी व फुर्ती से ‘जनसत्ता’ नयापन लिए, साफ-सुथरा, अधिक खिला हुआ होना ही था।

मेरे फैसले, राजेंद्र माथुर का समझाना!

जिंदगी के मेरे फैसले उटपटांग और दुस्साहसी रहे हैं। अंटी में कुछ नहीं होता था लेकिन चिंता नहीं कि कल क्या खाऊंगा!

राजेंद्र माथुरः मेरे मायने अलग!

सवाल है रज्जू बाबू की छाप बड़ी या प्रभाष जी की? दोनों की नहीं। मेरी अलग तासीर थी, रही और है। पर राजेंद्र माथुर क्योंकि मेरी पत्रकारिता के बालकाल में प्रेरक थे

चेहरेः  जिनसे बना जिंदगी का बूता!

सौभाग्य जो मुझे अच्छे लोगों का साथ, हाथ मिला। सवाल है क्या इनसे मेरे करियर, मेरा जीवनोपार्जन हुआ? नहीं…. कतई नहीं!

रावण को जलाते-जलाते रावण बनना!

मौजूदा वक्त में रावण के पुतले यों ही विशाल नहीं हैं, इनका शृंगार, इनकी साज-सज्जा, इनके अट्टहास, भाव-भंगिमाओं-गर्जनाओं का अभिनय या साक्षात अनुभव सबसे यह सत्य निर्विवाद है

और ध्वस्त बाबरी मस्जिद!

साढ़े चार सौ साल पहले 1528 की घड़ी में मंदिर ध्वंस-मस्जिद निर्माण को भुलाया नहीं जा सका तो छह दिसंबर 1992 को भी सभ्यतागत संघर्ष के इतिहास में बतौर मस्जिद ध्वंस-मंदिर निर्माण की याद्दाश्त अमिट रहेगी। उस दिन जो हुआ वह 15 अगस्त 1947 को आधी रात की आजादी से बड़ी घटना थी।

वह दिन था अर्थ क्रांति का!

15 अगस्त 1947 से 24 जुलाई, 1991 के 44 सालों में भारत के लोगों की बेसिक  जरूरते, जीवन पंडित नेहरू द्वारा स्थापित, पोषित व प्रचारित समाजवादी मॉडल की उस खिचड़ी, उस मध्य मार्ग में था जिसमें रेल रिजर्वेशन, हवाईजहाज से लेकर स्कूटर, फोन, बिजली आदि सबका उत्पादन, वितरण नई दिल्ली में बैठे मंत्रियों-अफसरों की अनुमति से होता था।

इमरजेंसीः विदेशी साजिश और वैश्विक इमेज

विदेशी साजिश के खौफ-पैरानॉयड मनोदशा में इमरजेंसी ( emergency conspiracy global image ) का फैसला था। हालातों के डर पैदा करने वाली खुफिया ब्रीफिंग में रॉ प्रमुख आरएन काव ने इंदिरा गांधी का कैसे-क्या माइंड बनाया इस पर किसी का फोकस नहीं रहा।… फिर पेंडुलम के दूसरे छोर पर नेहरू की बेटी को तानाशाह की वैश्विक बदनामी ने पहुंचाया। कैसे वे प्रजातंत्र स्थापक-पोषक पिता नेहरू की जगत पुण्यता के कंट्रास्ट में अपनी तानाशाह बदनामी पर विचार नहीं करतीं। तभी एक दिन उनका अपने स्तर पर चुनाव का फैसला था। यह भी पढ़ें: इमरजेंसीः पहेली और पैरानॉयड! emergency conspiracy global image : सवाल है यदि इंदिरा गांधी चुनाव नहीं करातीं और संजय गांधी को भारत भर में अपने लोगों का संगठन फैलाने के लिए पांच-दस साल का अवसर देतीं या एकदलीय व्यवस्था ले आतीं तो क्या जनता उसे गुमसुम वैसे ही बरदाश्त नहीं करती जैसे 19 महीने किया! मगर संजय गांधी के न चाहने के बावजूद इंदिरा गांधी ने चुनाव कराने का फैसला करके लोगों के हाथों में मतपत्र पहुंचाया। सब कुछ कंट्रोल में था। नॉर्मल था। न खुला विरोध, न भूमिगत आंदोलन और न बड़ौदा डायनामाइट कांड जैसे फटाके। विपक्ष के उस गुब्बारे को दुनिया ने जाना जिसमें अखबारों से… Continue reading इमरजेंसीः विदेशी साजिश और वैश्विक इमेज

इमरजेंसीः पहेली और पैरानॉयड!

अपना मानना है कि इंदिरा गांधी का इमरजेंसी ( emergency Indira gandhi ) लगाना और चुनाव का फैसला उनका खुद का निर्णय था। वे अंतर्मन से गाइडेड थीं। वे पार्टी में विद्रोह (चंद्रशेखर-धारिया की बेबाकी, जगजीवन राम-वाईबी चव्हाण आदि की महत्वाकांक्षाओं) के भय और विदेशी साजिश के डर के पैरानॉयड में थी। जिन्हें 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा भारत की 85 साल पुरानी पार्टी को तोड़ने का इतिहास ज्ञात है वे जानते हैं कि इंदिरा गांधी ने राजनीति को कैसी मनोदशा में खेला। मैं 1975-76 में पत्रकार नहीं था लेकिन जेएनयू में फ्रीलांसिग करने लगा था। ऐसा जेएनयू में होने के कारण नहीं था, बल्कि भीलवाड़ा में ‘नई दुनिया’ सहित उपलब्ध पत्र-पत्रिकाओं, ‘बीबीसी’ से बनी राजनीतिक चेतना से था। उस वक्त कच्चे दिमाग में जो दिलचस्पी बनी, उसके फ्लैशबैक में जब मैं मार्च 1971 से जून 1975 के चार सालों की घटनाओं पर सोचता हूं तो एक पहेली बनती है। सोचें, कांग्रेस के दो फाड़ के बाद इंदिरा गांधी ने अपने बूते लोकसभा की 352 सीटें जीती थीं। मार्च 1971 के चुनाव में विरोधी कामराज-मोरारजी कांग्रेस को सिर्फ 16 सीटें मिली थीं। तब नंबर दो पार्टी सीपीएम (25) थी और नंबर तीन पर जनसंघ (22 सीटें)। समाजवादियों की संसोपा-प्रसोपा के… Continue reading इमरजेंसीः पहेली और पैरानॉयड!

इमरजेंसीः खामोख्याल विपक्ष

इमरजेंसी की घोषणा के साथ पहले से बनाई लिस्ट अनुसार रात में सोते हुए जितने नेताओं-कार्यकर्तार्ओं को गिरफ्तार किया गया था वहीं इमरजेंसी बंदियों का असली लब्बोलुआब है। घोषणा के अगले दिन सूरज निकला तो तब गिरफ्तार हुए अपने केसी की जुबानी का सत्य कि दिल्ली की सड़कों पर, जेपी के पटना में इमरजेंसी के खिलाफ कुत्ता भी भौंकता हुआ नहीं था! indira gandhi in 1975 अनुभव में इमरजेंसी दिखती नहीं थी। विपक्ष को सांप सूंघा हुआ था। न प्रदर्शन थे और न आंदोलन। सन् 1975-76 में देश की आबादी कोई 70 करोड़ थी। लेकिन इमरजेंसी के खिलाफ पर्चे बांटते पकड़े गए लोगों की संख्या थी सात हजार। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बीस महीने में एक लाख 40 हजार लोगों की गिरफ्तारी का अनुमान लगाया था। और पता है इनमें सर्वाधिक कौन थे? 40 हजार सिख थे। इनके बाद आनंदमार्गी, नक्सलियों-मार्क्सवादियों की संख्या थी। हां, सबसे बड़ी संख्या अकाल तख्त की तानाशाही के खिलाफ आवाज के चलते थी। अकालियों ने सर्वाधिक गिरफ्तारियां दी। ऐसा किसी हिंदू संगठन या आरएसएस से जेल भरने का आव्हान नहीं था। इमरजेंसी का मर्दानगी से विरोध पंजाब में सिखों का और केरल में सीपीएम के काडर का था, जबकि दिल्ली से लेकर बिहार के हिंदी भाषी… Continue reading इमरजेंसीः खामोख्याल विपक्ष

इमरजेंसी… मुझे दिखी नहीं!

जेएनयू और दिल्ली घूमते-देखते हुए लगा ही नहीं कुछ असामान्य है। जन-जीवन, आवाजाही और अखबार सब सामान्य। हां, अखबारों में विपक्ष और राजनीति की खबर ढूंढे नहीं मिलती थीं और न इमरजेंसी की खबर। मानों भारत बिना विपक्ष और राजनीति के हो। जेएनयू में बंदिश, घुटन जैसा कुछ महसूस नहीं हुआ। न ही सहपाठी छात्र-प्रोफेसर-स्टाफ उद्वेलित या बेचैन।…. जेएनयू की उन दिनों की याद से अब समझ आता है कि 26 जून 1975 से लेकर 10 जुलाई 1975 के पंद्रह दिनों में जो होना था वह हो गया। hari shankar vyas jindageenama : छब्बीस जून 1975 का वह दिन…मैं तब भीलवाड़ा में था। जेएनयू में दाखिले की तैयारी करता हुआ। जुलाई में दिल्ली आया और अपने जिले के एमफिल छात्रों रविंद्र व्यास, नंदलाल गुर्जर और राजस्थान से ही आए प्रो. कुरैशी की मदद व पिछड़े इलाके जैसी कसौटी से दाखिला हुआ। गंगा हॉस्टल में कमरा नंबर 317 रहने का ठिकाना। तीसरे फ्लोर पर सामने सीताराम येचुरी का कमरा था।…तब नए-पुराने दोनों कैंपस मुर्दनगी में शांत से लगे। उन दिनों भीड़ वैसे भी नहीं थी और मेरे जैसे, छोटे शहर के छोटे कॉलेज से आए छात्र के लिए भव्य, मगर खाली-खाली इमारतों में सामान्य हलचल हैरान करने वाली थी। आबोहवा में… Continue reading इमरजेंसी… मुझे दिखी नहीं!

फ्लैशबैक में, लम्हों की खता!

ख्याल कौंधा है कि महामारी काल में जो ठहराव है वैसा अपने अनुभव में पहले कब था? दूसरा सवाल है कि ठहरे वक्त की किंकर्तव्यविमूढ़ता में पुरानी घटनाओं को फ्लैशबैक में टटोलें तो क्या निकलेगा? … आजाद भारत के इतिहास में सिर्फ छह-सात क्षण हैं, घटनाएं हैं जो 75 साल का कुल अनुभव हैं। कौन सी हैं ये घटनाएं? एक, चीन से हार। दो, बांग्लादेश जीत। तीन, इमरजेंसी। चार, ब्लूस्टार ऑपरेशन। पांच, नरसिंह राव की अर्थ क्रांति। छह, अयोध्या में मस्जिद ध्वंस। सात, मंडल आयोग। आठ, कोविड-19 महामारी। पंडित का जिंदगीनामा: लंदनः समझदारी की पाठशाला पंडित का जिंदगीनामा-18:  ( hari shankar vyas ) महामारी काल….. अनिश्चित जिंदगी और उसे छोटा बनाता समय! तभी मुझे जीवन के उत्तरार्ध में वक्त को यादों में गुनगुनाते हुए होना चाहिए। जिंदगीनामा लिखते जाना चाहिए। लेकिन मैं भटका हूं! मान नहीं रहा हूं कि अखबारी सुर्खियों के खटराग में कुछ नहीं है। हिंदुओं का कलियुग कभी खत्म नहीं होगा। हमारे जीवन में देवत्व, आजादी, निर्भीकता, सत्यता और वह सभ्यता, वह सतयुग खिल ही नहीं सकता जो पशुता-एनिमल फार्म से दीगर पृथ्वी के कई मानवों का विकास है। यही सोचते हुए दिमाग फिर जिंदगी पर लिखने को कुलबुला रहा है। क्यों नहीं कुछ दिन दिमाग में… Continue reading फ्लैशबैक में, लम्हों की खता!

जिंदगीनामा ठहरा, ठिठका!

 ‘पंडित का जिंदगीनामा’ लिखना कोई साढ़े तीन महिने स्थगित रहा। ऐसा होना नहीं चाहिए था। आखिर जब मौत हवा में व्याप्त है तो जिंदगी पर  सोचना अधिक हो जाता है। तब स्मृति, आस्था, जिंदगी के गुजरे वक्त की याद ज्यादा कुनबुनाती है।

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