“बात राष्ट्रवाद की है”!

गैय्या के खेत चरने के बावजूद किसान मतदाता गैय्या की पूंछ पकड़ ही आस्था के वोट डालने वाला था।

‘भय’ में चुनाव और नतीजे से भी ‘भय’!

पांच राज्यों में भाजपा सन् 2017 की तरह खिलखिलाती चुनाव जीते। यदि वह नहीं जीतती है तो मोदी-शाह और भाजपा तब कैसे भय में आगे रहेंगे?

“हवा किस की चल रही है?”

वाराणसी। हवा नहीं है लेकिन गर्मी है। सूरज का पारा चढ़ता हुआ। सबको झुलसाता लेकिन यह बैचेनी और संस्पेंस बनाता हुआ कि मतदान खत्म होने के कगार पर है तो होगा क्या?

काशी में मोदी को खुद लड़ना पड रहा!

क्या काशी कॉरिडोर वाली शहर दक्षिण सीट भाजपा हार रही है? क्या नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र भी सुरक्षित नहीं है?

चल कर देखें, गैय्या चर गई वोट!

इतने भी आप क्यों नाराज? जवाब में गुस्साए जनार्दन ने कहा चलके देखिए कैसे पूरी रात खेत में बैठ कर चौकीदारी करनी होती है।…

तकलीफों में खदबदाता पूर्वांचल

बस्ती में लगा जैसे मुसलमान मन की बात नहीं बताता है वैसे पूर्वांचल में ब्राह्मण भी मोटा मोटी गुमसुम है। वह फटाक नहीं बोलता कि आएगा तो योगी!

पूर्वांचल की सनसनी नेहा सिंह राठौर!

नेहा सिंह राठौर भोजपुरी की सनसनी हैं, सोशल मीडिया की सनसनी हैं तो यूपी की राजनीति, योगी-मोदी के वक्त में हवा बदलवाने वाली सनसनी भी।

सिराथू में केशव मौर्य का पसीना छूटा!

उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की उम्मीदवारी से सुर्खियों में आई सिराथू सीट पर रविवार को मतदान सस्पेंस में खत्म हुआ।

अयोध्या में नाराज ही नाराज!

राम के अयोध्या लौट आने की उम्मीदों पर राम नगरी अर्से से जिंदा है। इस इच्छा पर सन् 2019 में सुप्रीम कोर्ट का ठप्पा लगा। राम जन्मभूमि-बाबरी मसजिद विवाद हल हुआ।

पूर्वांचंल में जातिय बीहड और जौनपुर

यूपी के आखिरी सात मार्च के चरण में जौनपुर जिले की नौ सीटों पर मतदान है। मतदान आते-आते हिंदू-मुस्लिम धुव्रीकरण व जातिय समीकरणों की गणित में वोटर का मूड कुछ भी हो सकता है।

‘भक्त’ नौजवान का जवाब तयशुदा!

फार्मेसी का एसएन कॉलेज और भोजपुरी फिल्म के शूटिंग सेट पर नौजवानों की भीड। बतौर लीड एक्टर समरसिंह सभी के आकर्षण का केंद्र।

“योगीजी ही वापिस आएंगे”

उत्तर प्रदेश की राजधानी की सियासी आबोहवा में चुनाव की चर्चा, कौन सही और कौन गलत, किसे वोट देना है और किसे नहीं वाली बातें मतदान पूर्व बेबाकी से सुनने को मिलीं।

काला-अंधा वर्ष 2040… और वजह?

आजाद भारत के इतिहास में अब से पहले कब ऐसा वक्त था जब वर्तमान के साथ भविष्य की इतनी चिंताएं, अनिश्चितताएं दिखती हुई होती थी

उम्मीद, विस्फोट, और गुजरा 2021..

बारह महीने!  साल भरोसे से शुरू हुआ। पर मार्च खत्म होते-होते वायरस झेला और भय व मृत्यु के आघात भी। …कही बाईस वैसा ही तो नहीं होगा जैसा इक्कीस हुआ।

कुछ क्लासिक और ‘ए पैसेज नार्थ’

जैसे “हम जिस वर्तमान को मानते हैं वह हमारे सामने है, हमेशा के लिए, जीवन की कुछ ऐसी चीजों में से एक है, जिससे हम अलग नहीं हो सकते”।

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