आने वाले बुरे दिन

कश्मीर का कोई समाधान नहीं है क्योंकि कश्मीरी मुसलमान, घाटी के प्रमुख और जो भी असरकारक हैं वे मुसलमान समाधान नहीं चाहते हैं।

न्यू इंडियाः कहां, कैसा, क्या?

जी हां, ‘न्यू इंडिया’ का सत्य, अप्रिय तथ्य इस एक लाइन में सिमटा हुआ है कि ‘उनमें ध्रुवीकरण, सख्त और मारक है’।

कश्मीर का ‘नया’ होना क्या?

kashmir after article 370 remove : कश्मीर को ‘नया कश्मीर’ क्यों कहा जा रहा है जब भावना, उसका होने का एक हिन्दू का अहसास अब भी ‘दूसरों’ का ही है। अनुच्छेद 370 खत्म करने से आत्मविश्वास या शांति की कौन सी भावना जगी है जिसका प्रचार देश के बाकी हिस्से और दुनिया भर में ‘नया कश्मीर’ के रूप में किया जा सकता है?… गुजरे इन तीन वर्षों के बाद भी कश्मीर को जैसा मैं जानती थी, कश्मीर वैसा ही है।  अलग-थलग कड़वाहट के साथ। पहले के मुकाबले ज्यादा। यह भी पढ़ें: जितिन प्रसाद प्रसंग : ‘राजनीति आज’ का सत्य kashmir after article 370 remove : कश्मीर में होना हमेशा एक अनुभव होता है। जबरदस्त सौंदर्य में भरे क्षेत्र में घर पर होना, वहां का होना अलग अहसास कराता है। घर के सुरक्षित परिवेश से बाहर कदम रखना और कॉलोनी के बड़े काले गेट की सीमा बोध कराती है कि आप यहां के होकर भी यहां के नहीं हैं! यह अहसास यहां के होने पर हावी होता है, ज्यादा बोझ लिए हुए। शरीर में अजीब सी सनसनी महसूस होती है। हड्डियों तक को महसूस होता है कि लोग आपको संदिग्ध नजरिए से देख रहे हैं, आपसे नाराज हैं; तब भी जब… Continue reading कश्मीर का ‘नया’ होना क्या?

जितिन प्रसाद प्रसंग : ‘राजनीति आज’ का सत्य

जितिन प्रसाद प्रसंग : सीधे-सरल शब्दों में इजराइल ने एकजुट होने की इच्छाशक्ति हासिल की और ऐसा पार्टियों द्वारा पुरानी मान्यता, जिद्द-स्वार्थों को छोड़ कर हुआ। यह एकता, “आओ, मिल कर बेंजामिन नेतन्याहू को बाहर करें” के बीज मंत्र पर थी। इस तरह, इजराइल ने एकजुटता पाई, संकल्प पाया जबकि भारत में विपक्ष परत दर परत खोता हुआ। यह भी पढ़ें: ब्लू टिक… वक्त को खाता नया नशा! कुछ साल पहले जितिन प्रसाद से एक कम प्रभाव वाली निस्तेज हस्ती के रूप में सामना हुआ था। वे बनारस की एक उड़ान पकड़ने के लिए लाइन में थे। उनके बारे में सुना कम था लेकिन वे कांग्रेस के ‘ब्राह्मण चेहरे’ हैं, यह पता था। उस नाते उन्हें 2017 चुनाव में पार्टी के लिए प्रचार करने, लोगों को यकीन दिलाने और मूड बनाने का जिम्मा मिला था। जी हां, नोटबंदी बाद वाला वहीं चुनाव, जिसमें ‘करेंसी’ कम हो पवित्र-सफेद बन गई थी, और नरेंद्र मोदी की अपराजेयता जस की तस। जितिन प्रसाद धुले हुए, इस्त्री किए, अच्छे कड़क कपड़े पहने हुए चिंताविहीन और परेशानी से मुक्त लगे थे। लेकिन वे जानते थे तभी निश्चिंत-शांत भाव कहना था नुकसान तय है… कोई अवसर नहीं! सुन कर साथी यात्री की टिप्पणी थी, “कांग्रेस के… Continue reading जितिन प्रसाद प्रसंग : ‘राजनीति आज’ का सत्य

ब्लू टिक… वक्त को खाता नया नशा!

बूढ़ा या जवान, शहरी या आम आदमी, ग्रामीण या सूट टाई वाला– हर कोई अपने फोन पर (और जियो के सौजन्य से भी) अपने सोशल मीडिया अकाउंट देख रहा है, वर्चुअल विश्व में मशहूर होने का हर आम और खास तरीका आजमा रहा है।… अपने को महान, खास बनाने की यह भूख भी नए नशेड़ी बना लोगों को भटका रही है, खोखला बना रही है।    यह भी पढ़ें: लहर बाद: क्या जीवन सामान्य, सुरक्षित?  इन दिनों शहर में, देश की राजधानी…. ठीक-ठीक कहूं तो दिल्ली में ट्विटर के लुटियन जोन में नई चिंता है। गुजरे कुछ दिनों से ट्विटर के ब्लू टिक वाले खाते गजब का तनाव झेल रहे हैं क्योंकि फॉलोअर घटते जा रहे हैं। दूसरी ओर ट्विटर से बहुत सारे लोगों को झटका मिला है। लोगों के वेरीफिकेशन कराने या ब्लू टिक पाने के निवेदन खारिज हुए हैं। इस पर बहुतों ने गहरी नाराजगी जताई। एक पुरानी, मशहूर अंग्रेजी पत्रिका के संपादक भौंचक थे कि उन्हें भी ब्लू टिक देने से इनकार किया गया। उन्होंने निराशा में ट्विट किया- “must admit my vanity was hurt”! हिंदी में कहूं तो, ‘मानना पड़ेगा मेरा घमंड, अहम चूर हुआ’! और मैं झूठ नहीं बोलूंगी, मैंने भी अपने लिए, इस अखबार, संपादक,… Continue reading ब्लू टिक… वक्त को खाता नया नशा!

लहर बाद: क्या जीवन सामान्य, सुरक्षित?

लहर गुजर गई लेकिन जीवन और उसके सवाल अनिश्चितताओं में बांध कर। कैसे जीया जाए कि बजाय अब जी भी सकने की बैचेनी बनी है।…महामारी जारी है, वैक्सीन के लिए संघर्ष मुश्किल होता जा रहा है।….. तो जीवन कैसे बेफिक्री से जीया जाए? डर कैसे दूर हो? भविष्य दूर लग रहा है। अलग-थलग पड़ जाने, जान जाने का डर हर समझदार का बना हुआ है। फिर भी प्रचारित किया जा रहा है जैसे सब सामान्य हो गया है। …..पर क्या वाकई? यह भी पढ़ें: मूर्खता से बड़ी महामारी कोई और है ही नहीं। एफिल टावर के सामने की पुरानी तस्वीरें देख दिमाग घूम गया। सोचने लगी क्या यात्रा के मुकाम कभी वैसे ही बनेंगे जैसे थे? क्या ये जगहें फिर पहले जैसी हो पाएंगी? क्या ‘पुर्तगाल में स्काई डाइविंग’, ‘मोरक्को के बाजार में यूं ही टहलने’ जैसे बकाया काम किए जा सकेंगे? अपनी इच्छाओं- चाहत की ‘बकेट लिस्ट’ पूरी करने के दिन में सपने देखना फिर क्या संभव है? अपनी दिली इच्छाओं की पूर्ति के लिए क्या मैं जिंदा रहूंगी? लहर गुजर गई लेकिन जीवन और उसके सवाल अनिश्चितताओं में बांध कर। कैसे जीया जाए कि बजाय अब जी भी सकने की बैचेनी बनी है। यह भी पढ़ें: वक्त आज..… Continue reading लहर बाद: क्या जीवन सामान्य, सुरक्षित?

मूर्खता से बड़ी महामारी कोई और है ही नहीं।

हम यहां कैसे पहुंचे है? …..मूर्खता से, क्योंकि मूर्खता से बड़ी महामारी कोई और है ही नहीं।..भारत सात साल पहले उम्मीदों में झूमता हुआ था। अच्छे दिनों की आशा में मग्न था। चाशनी में डूबे शब्दों के जरिए हमें रोज नई-नई मिठाई की खुश्बू पहुंचाई जाने लगी थी। ….पर  शासन के नाम पर कुशासन और ऊपर से झूठ का कभी नहीं रुकने वाला सिलसिला।… ऐसे में महामारी को भी झूठ में बदला जाना ही था। वायरस को हल्के में लिया जाना था। वही हुआ और तभी सात साल पुरानी कहानी खलास और उसकी जगह रूलाई की कहानी! यह भी पढ़ें: वक्त आज.. मैंने हवाओं से पूछा! कहानी की जगह केवल कहानी ही ले सकती है! अब कहानी नरेन्द्र मोदी नामक उम्मीद की नहीं है बल्कि उम्मीद के नाउम्मीद होने की है जिसमें भारत खुद को फंसा-जकड़ा पा रहा है। कहानी अब भारत की तकलीफ की है। ऑक्सीजन को तरसते लोगों की कहानी है, जिसमें कहानी सुनाने वाला कहीं छिपा हुआ है। कहानी परिवार के लोगों और मित्रों के निधन से रोते, बिलखते और दुखी लोगों की भारत रूदाली की है, जबकि कहानी सुनाने वाला गुमशुदा है, वह लगातार कही छिपा हुआ है। कहानी भारत की वित्तिय बर्बादी और अनिश्चितता में… Continue reading मूर्खता से बड़ी महामारी कोई और है ही नहीं।

वक्त आज.. मैंने हवाओं से पूछा!

दुनिया भर से आ रहे चिंता जताने वाले संदेश, सरोकार दिखाने वाले सवालों से इनबॉक्स भरे हैं। मैं कई दिनों तक उनकी अनदेखी करती हूं पर सवालों में चिंता बढ़ती जाती है। ….. लेकिन मैं उनसे क्या कहूं? क्या यह कहूं मैं ठीक हूं, जबकि यहां से हजार किलोमीटर दूर शवों के ऊपर टायर और केरोसीन डाल कर उन्हे जलाया जा रहा है?…. झूठ है कि सब ठीक है, मरीजों की संख्या कम हो रही है, जबकि गांवों में लोग सामूहिक रूप से अपनों का जलप्रवाह कर रहे हैं। अब मैं भूल चुकी हूं कि साफ हवा की गंध कैसी होती है। लेकिन मैं कह सकती हूं कि बाहर की हवा भी अंदर की हवा की तरह बासी और जहरीली है। इसमें भय की कच्ची गंध, पागलपन का पसीना और मुश्किलों की सड़ांध है। पिछली बार से बदला हुआ..इस बार घबराहट में होने वाली खरीद नहीं है। मैगी के पैकेट खरीद कर घरों में नहीं भरे जा रहे हैं और न चावल, दाल, पास्ता या चटनी-केचअप की खरीद हो रही है, खुशबूदार बॉडीवॉश या यहां तक कि आटा-मैदा भी खरीद कर नहीं भरा जा रहा है। इस बार सड़कों पर आवारा कुत्ते घबराए हुए नहीं हैं। वे खाना देने वाले… Continue reading वक्त आज.. मैंने हवाओं से पूछा!

16 मईः हमारी तारीख, हमारी प्राप्ति, पर चिंता की भी तारीख!

हम तिथियों की महत्ता मानते हुए, उसकी पूजा करते हुए जीते है। उनका खास अर्थ उसके खास भाव से होता है। तारीख विशेष के हम कतृज्ञ होते हैं। तारीख बहाना होती है उत्सव का, समझने का, रस-रंग में डूबने का। उनसे हम इसलिए भी प्रेम करते है क्योंकि वे जीवन के मकसद की याद दिलाती हैं। तारीखें उष्म, मूल्यवान और स्वप्निल होती हैं। 16 मई एक ऐसी ही खास तारीख है, खास अर्थ लिए हुए। यह भी पढ़ें :   त्रासद है यह नया भारत यह तारीख हमारे लिए, ‘नया इंडिया’ की छोटी सी टीम के लिए उत्सव की है तो राहत के साथ चिंता की भी। उत्सव-संतोष-खुशी इसलिए कि ‘नया इंडिया’ आज अपने अस्तित्व के 11 वर्ष पूरे कर रहा है। लंबी सांस के साथ राहत इस कारण कि बिना प्राण वायु, साधन-संसाधन-विज्ञापन के बावजूद ‘नया इंडिया’ जिंदा है। लेकिन दिल-दिमाग बोझिल है इस सवाल से कि– क्या हम बदहाल-अंधकारमय वक्त में लक्ष्मी के श्राप, धन-साधन की अनिश्चितता, अभाव में जिंदा रह पाएंगे? पिछले दो साल, तिल-तिल कर खत्म होती ऑक्सीजन के… उत्सव रूखे-सूखे लेकिन वही सवालों की आग जलाने, फड़फड़ा देने वाली। पिछले वर्ष में ‘नया इंडिया’ फरवरी से ही शत-प्रतिशत घर से काम में बनता-निखरता और धार… Continue reading 16 मईः हमारी तारीख, हमारी प्राप्ति, पर चिंता की भी तारीख!

रोया दीया और अचानक।।।वे क्षण, वह मूड!

दिन 28 जनवरी। वक्त कोई रात के 9.30 बजे। दिन भर दिल्ली की सिंघू सीमा पर किसानों का मूड समझने-बूझने के बाद मैं गाजीपुर के प्रदर्शनस्थल पर थी। सब कुछ नियंत्रित और शांत।

बरबाद, फेल देश छोड़ कहां जाएं लोग?

त्रासदियां भुले हुए को, बिछुड़ों को मिलाती हैं। हाल की त्रासद घटना ने मुझे अपनी उस पुरानी दोस्त से फिर मिला दिया जिसे मैं सालों से भूली बैठी थी। मैं रैने से 2006 में तब मिली थी जब हम दोनों सेंट एंड्र्यू में साथ पढ़ते थे।

त्रासद है यह नया भारत

इतिहास रचने वालों को अपने खाते में वह उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करनी होती है जो न केवल एक विरासत के रूप देखी जाती है, बल्कि इतिहास को भी नए सिरे से परिभाषित करती है।

कोविड के बाद की खौफभरी दुनिया

कोविड के बाद की दुनिया कैसी होगी? जिस तरह की नई वैश्विक व्यवस्था सामने आएगी, उसमें जिंदगी कैसी होगी, हम कैसा महसूस करेंगे? ये सन् 2020 के ऐसे बुनियादी सवाल हैं जो ह सबको हैरान-परेशान किए हुए हैं।

कब तक दामाद बना रहेगा कश्मीर !

कश्मीर क्या है, यह समझ पाना आसान नहीं है और कश्मीर की समस्या कैसे सुलझाए यह यक्ष प्रश्न है।  साल पहले संविधान के अनुच्छेद 370 को निप्षप्रभावी करते हुए एक साहसी कदम उठाया गया था।

युवा नेताः विचार में सूखे, अवसर के भूखे!

सन् 2020 का वक्त विचार, विचारधारा और आदर्शो का नहीं है। न युवा राजनीति, यूथ नेता विचार और संर्घष में पके है। तब यदि यूथ नेता बदलते फैशन की तरह पार्टियां बदले, नए रंग आजमाए तो क्या आश्चर्य

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