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Wednesday, April 14, 2021
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शब्द फिरै चहुँधार

महामारी में ‘मृत्यु’ ही है विषय!

अच्छा नहीं लगा, एक पुण्यात्मा की स्मृति में चंद लोगों को देख कर। वजह? शायद महामारी काल! मतलब मृत्यु काल! वक्त का यह रूप सभी सभ्यताओं में मौत का प्रतिबिंब है।

सन् बीस का काला नीच काल!

वक्त और जीवन यदि परस्पर गुंथे हुए हैं और उसी से अर्थ है तो अपने-अपने अनुभव में वक्त पर विचार जरूर करना चाहिए। मानवता, दुनिया, समाज की बजाय निज जीवन असली अनुभव है।

जसवंत सिंहः गरिमा, बुद्धि का प्रखर व्यक्तित्व

जसवंत सिंह पचंतत्व में विलीन हुए। जोधपुर में घर-फार्म हाउस में उनके बेटे मानवेंद्र सिंह ने जब उनको मुखाग्नि दी तो मैं मौजूद नहीं था लेकिन मैं कोरोना काल के इस वक्त में मन से उस क्षण का साक्षी हुआ पड़ा था जब हंस के उड़ चलने की खबर सुनी थी।

वायरस का अनुभव ‘असामान्य’

अब परिचितों में वायरस की खबरें बढ़ गई हैं। जगदीश ने सूचना दी कि कैलाश का पूरा परिवार संक्रमित है तो अलवर से संजय अरोड़ा ने बताया कि वे फोन इसलिए नहीं उठा रहे थे क्योकि वे, उनका मैनेजर, परिवार के चार सदस्य महीने भर से कोरोना से जूझ रहे थे।

सिस्टम (दीमक) से न यशस्वी, न विभूतियां!

अपने अजीत द्विवेदी ने पते की बात कहीं। पंडित जसराज के प्रसंग में कहा, दोष आजादी पूर्व की विभूतियों, यशस्वियों का भी है। आखिर पंडित नेहरू ने आजादी के बादसरकारी संस्थान बनाए।कई विभूतियों को उनका प्रमुख बनाया।

अपनी ‘शास्त्रीयता’ के आखिरी ‘यशस्वी’!

यश के राजा जसराज और शास्त्रीय गायकी के आखिरी यशस्वी! अब ‘आखिरी’ शब्द भारी है।

बुद्धि नहीं सुधारेंगे तो नहीं बनेंगे!

मैं भारत और हिंदू पर विचारते हुए थका हूं! पर थकावट क्योंकि हर रोज देश-दुनिया की घटनाओं पर गौर करते हुए दिमाग की भन्नाहट में बदलती है तो सोचना-लिखना भला कैसे बंद हो!

सात्विक से तामसी बुद्धि का सफर

लाख टके का सवाल है हम हिंदुओं की बुद्धि क्या पहले भी वैसी थी जैसी आज है? नहीं। वैदिक काल हिंदूबुद्धि का सात्विक-स्वर्णिम युग था। हिंदुओं को धर्म मिला।

अंधे हैं लेकिन पता नहीं अंधे हैं!

भारत की समस्या हिंदू हैं। हिंदू की समस्या बुद्धि है। बुद्धि की समस्या गुलामी से बनी प्रवृत्तियां हैं। हिंदू की प्रवृत्तियां, उसका चेतन-अचेतन-अवचेतन का वह मनोभाव है

बुरे वक्त में पृथ्वी का कंपकंपाना और…

जीवन बार-बार, लगातार व्यक्ति विशेष के आगे सवाल बनाता है यह कैसा वक्त? पर पृथ्वी के पौने आठ अरब लोग कब ऐसा सोचते हैं कि यह कैसा वक्त? तब जब बुरा वक्त आता है।

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