• भाजपा का यूपी में ऐसा कैसे?

    हिंदुओं के तीर्थ अयोध्या, रामेश्वरम में मिली हार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को काशी में पिछली बार के मुक़ाबले बहुत कम अंतर से मिली जीत से कई तरह के सवाल उठते है।  इन नतीजों के बाद सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत द्वारा ‘अहंकार’ की ओर इशारा करना भी क्या इस बुरे प्रदर्शन का कारण बना?  सूत्रों के अनुसार इस बार के चुनावों कम सीट आने के पीछे भाजपा में अंदरूनी कलह ने भी एक बड़ी भूमिका निभाई। ‘अचानक कहीं कुछ नहीं होता, अंदर ही अंदर कुछ घिस रहा होता है, कुछ पिस रहा होता है।’ इन पंक्तियों में कवि ने इस...

  • खुशफहमी न पाले, कांग्रेस अब अपने को ठिक करें!

    इस मीडिया का जो वर्ग चरित्र है वह जनविरोधी है। और राहुल की पूरी राजनीति जन समर्थक। आम जनता के हित में। इस मीडिया की खुशामद करके आप इससे काम नहीं ले सकते। इसे तो डरा कर जैसा मोदी जी करते हैं आप सही रख सकते हैं।... कांग्रेसी नेताओं को सिर्फ चाहिए ही चाहिए। देना उन्होंने नहीं सीखा है। इतना पैसा है कांग्रेसी नेताओं के पास कि दस साल क्या अभी जाने कितने साल वे पार्टी का पूरा खर्चा चला सकते हैं।... राहुल के पास अब टाइम ही टाइम है। क्या करना है? मगर करने को कुछ सबसे जरूरी काम...

  • असली और नकली राजा

    सहज राजा अपने पूर्ववर्ती, प्रतिद्वंद्वी, या मातहत के प्रति ग्रंथि से मुक्त होता है। उसे किसी से अपनी चमक फीकी पड़ने का अंदेशा नहीं होता। नकली राजा हर बात से अपनी कमतरी दिखने के डर में रहता है। उसे अपना गुणवान मंत्री, मंत्री का अच्छा सचिव भी नागवार गुजरता है। यह क्षुद्र मानसिकता नकली राजा की पहचान है कि वह सदा शंकालु रहे, बेरंग सहयोगी ढूँढे, ताकि केवल राजा का रंग दिखे!.....भाजपाई अपने सभी कुकर्मों का बचाव कांग्रेस का उदाहरण देकर ही करते हैं! जो अचेत स्वीकृति है कि असली राजा कांग्रेस है। नकली, इम्पोस्टर, तो बस नकल ही कर...

  • उमर व महबूबा दोनों की हार का क्या अर्थ?

    जिस तरह से पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की लोकसभा चुनाव में हार हुई है उससे यह संकेत मिल रहे हैं कि कहीं न कहीं वंशवाद को लेकर कश्मीर के लोगों में नराज़गी भी दिखाई दे रही है। लोगों ने दोनों ही बड़े नेताओं को जिस तरह से नकारा है उससे यह साफ है कि लोग कश्मीर में स्थापित नेताओं का विकल्प ढूंढ रहे हैं। बारामूला लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली 18 विधानसभा क्षेत्रों में से इंजीनियर राशिद ने 14 क्षेत्रों पर भारी बढ़त बनाई जबकि उमर अब्दुल्ला मुश्किल से केवल तीन विधानसभा क्षेत्रों में आगे रहे।...

  • अयोध्या में भाजपा क्यों हारी?

    हजारों भक्त कितने किलोमीटर चलकर आते हैं लेकिन मंदिर ट्रस्ट या अयोध्या प्रशासन के द्वारा सुविधाओं के अभाव में वो इधर-उधर भटकते हैं। स्वच्छ पेयजल के कुछ फ्रिज अभी गर्मी बढ़ने पर लगाए है। लेकिन चंदे के ₹10,000 करोड़ के ब्याज रूपी 1800 करोड़ रुपए में बन रहे मंदिर के बाकी पैसे की एफडी कराई जा रही है। परंतु राम का पैसा राम के भक्तों पर खर्च नहीं हो रहा। पांच सौ साल बाद प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। यह हम सभी सनातनियों के लिये गर्व की बात है। अयोध्या में हुए इस निर्माण...

  • मोदी लड़खड़ाए तो गड़बड़ाएं उन पर लगे बड़े-बड़े दांव

    चूंकि मोदी अब अभेद्य नहीं दिख रहे, तो मार्केट की एजेंसियों ने अंदेशा जताना शुरू कर दिया है कि गठबंधन पर निर्भर सरकार के लिए दूरगामी प्रभाव वाले सुधारों को लागू करना अधिक कठिन हो जाएगा।।।। फिच रेटिंग्स के निदेशक जेरम जूक ने कहा- तीसरे कार्यकाल में भाजपा सरकार को अपने गठबंधन सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा। इस कारण जमीन और श्रम से संबंधित विवादास्पद सुधारों को लागू करना उसके लिए ज्यादा मुश्किल हो जाएगा, जबकि भाजपा ने चुनाव के दौरान इन्हें अपनी प्राथमिकता बताया था। आम चुनाव के नतीजों से नरेंद्र मोदी के रुतबे पर स्थायी किस्म का प्रहार...

  • जनादेश तो मोदी को ही मिला है

    यह एक तकनीकी स्थिति है कि भाजपा को पहले जितना मत प्रतिशत होने के बावजूद सीटों की संख्या में कमी आ गई। लेकिन इतना स्पष्ट है कि जनादेश श्री नरेंद्र मोदी को ही मिला है। उनके नेतृत्व में एनडीए ने चुनाव लड़ा था। उनके नाम और 10 साल के काम पर वोट मांगा गया था। चाहे बिहार में नीतीश कुमार हों या आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू सबने मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट मांगा था और मतदाताओं ने उनकी झोली भर दी। लोकसभा चुनाव, 2024 के परिणामों का विश्लेषण कई पहलुओं से किया जा रहा है। एकाध अपवादों...

  • ईवीएम पर सवाल उठाने वाले माफी मांगें

    ईवीएम और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाकर देश को कलंकित किया जा रहा था। चुनाव परिणाम ने न केवल इस प्रकार के मिथकों को तोड़ दिया, साथ ही इसने भारत के जीवंत, बहुलतवादी, पंथनिरपेक्षी और स्वस्थ लोकतांत्रिक छवि को पुनर्स्थापित किया है। अठारहवें लोकसभा चुनाव के नतीजे अपने अंदर कई संदेशों को समेटे हुए है। पहला— पिछले कुछ वर्षों से विरोधी दल, विदेशी शक्ति और मीडिया के एक भाग द्वारा नैरेटिव गढ़ा जा रहा था कि देश की लोकतांत्रिक-संवैधानिक संस्था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘जेब’ में है— अर्थात् प्रजातंत्र समाप्त हो चुका है। ईवीएम और चुनाव आयोग की...

  • ….इसलिए यूरोप के बड़े क्लबों में नहीं खेल पाया क्षेत्री !

    सुनील छेत्री की जगह कौन भारतीय फुटबॉलर लेगा? फिलहाल यह सवाल जस का तस बना हुआ है। इसलिए क्योंकि पिछले बीस सालों में अकेला सुनील भारत की कमजोर और दीन-हीन फुटबॉल का पालनहार बना रहा। जब कभी टीम संकट में आई तो नजरें एकमात्र खिलाड़ी पर लगी रहती थीं और उसने कभी भारतीय फुटबॉल प्रेमियों को निराश भी नहीं किया। बेशक, भारतीय फुटबॉल के तमाम रिकॉर्ड उसके नाम दर्ज हैं। देश के लिए 150 बार खेलने वाला यह स्टार स्ट्राइकर 94 अंतरराष्ट्रीय गोल जमाने में सफल रहा है, जो कि क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोनेल मेस्सी जैसे दिग्गज सितारों के बाद...

  • न तुम जीते न वो हारे!

    जहां नई लोकसभा के गठन का सवाल है तो इसको ले कर, पक्ष- विपक्ष के मायने में यह कहना ग़लत नहीं होगा कि ‘न तुम जीते न वो हारे’।‘इंडिया’ गठबंधन पर जिस तरह देश के मतदाताओं ने भरोसा जताया है उससे यही सिद्ध हुआ है कि देश में ‘लोक’ का ‘तंत्र’ अभी जीवित है। अब सरकार भले एनडीए गठबंधन की बने लेकिन देश की संसद में विपक्ष को अच्छी संख्या में स्थान मिलेगा। सन् 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने सभी को चौंकाया है। सत्तापक्ष के बड़े-बड़े दावे और उसी से मिलते-जुलते एग्जिट पोल के बाद किसी को ऐसे...

  • अब लद्दू मत बनिए नरेंद्र भाई

    अगर वे 2014 की ही तरह 2024 में भी प्रधानमंत्री बनने के लिए अड़े रहे तो अपनी डोली ढोने वाले कहार इस बार कहां से लाएंगे? कहारों की यह अनुपस्थिति ही आगामी ओस-बूंदों का आश्वासन है। नरेंद्र भाई मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने का नैतिक हक़ भी खो चुके हैं और तकनीकी हक़ भी। बावजूद इस के अगर वे ख़ुद को रायसीना की पहाड़ी पर लादने की कोशिश करेंगे तो मैं पूरी तरह आश्वस्त हूं कि उन की इस ढिठाई पर देशवासियों के मन से तो वे और भी ज़्यादा तिरस्कृत होंगे ही, भारतीय जनता पार्टी और उस के पितृ-संगठन...

  • मोदी युग के अंत की हुई शुरुआत

    चुनावी राजनीति का एक हद तक सामान्य रूप रूप में लौटने का संकेत ही इस आम चुनाव की विशेषता है। इसका अर्थ यह है कि नरेंद्र मोदी परिघटना (phenomena) पर विराम लग गया है। यह धारणा टूट गई है कि नरेंद्र मोदी का करिश्मा चुनावों में उसकी सफलता की गारंटी बना रहेगा। इस आम चुनाव में वास्तव में यही कथित करिश्मा जख्मी हुआ है। साल 2024 में आकर राष्ट्रीय जनादेश एक बार फिर खंडित रूप में सामने आया है। वैसे 2014 और 2019 में भी जनादेश इलाकाई आधार पर खंडित रहा था। तब उत्तर और पश्चिमी भारत में भाजपा का...

  • मोदी-योगी का भौकाल टूटा, राहुल-अखिलेश का जलवा बना

    राहुल ने कहा था यूपी सबसे बड़ा उलटफेर करेगी। इंडिया गठबंधन 50 सीटों परजीतेगी। अखिलेश ने भी ऐसा ही कहा था। जबकि गोदी मीडिया के एक्जिट पोलइंडिया को पांच सीटे भी देने को तैयार नहीं थे। मगर जनता ने मोदी और योगी दोनों का अहंकार तोड़ दिया। बता दिया कि वोटकाम करने से मिलते हैं। बातों से नहीं। बुलडोजर लोगों का दिल नहीं जीतसकता। तो क्या है चुनाव का मैसेज? सबसे बड़ा यह कि अहंकार किसी का नहीं रहता।इस चुनाव के शुरू होने तक या यह कहिए मंगलवार सुबह तक भी प्रधानमंत्रीमोदी यह समझ रहे थे कि वे देश की...

  • पाकिस्तान में हिंदू विरासत कैसे बचे?

    पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की नील घाटी में पौराणिक शारदापीठ एक ऐसा तीर्थस्थल है जिसका विकास कश्मीरी पंडित व अन्य हिंदू ही नहीं, नील घाटी में रहने वाले मुसलमान भी करवाना चाहते हैं। क्योंकि श्री करतारपुर साहिब कॉरिडोर की तरह विकसित हो जाने पर उन्हें यहाँ अपनी आर्थिक समृद्धि की असीम संभावनाएँ दिखाई देती हैं।..इस तीर्थ के जीर्णोद्धार और इस संपूर्ण क्षेत्र के विकास के लिए शारदापीठ कश्मीर के शंकराचार्य स्वामी अमृतनंद देव तीर्थ कई वर्षों से सक्रिय हैं। यों तो पश्चिमी पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी आज बढ़ कर 2.1 प्रतिशत हो गई है, जो आज़ादी के समय पाकिस्तान में...

  • चुनाव 2024 में दिखी आम दुर्दशा की हकीकत

    जब कभी और कहीं भी गंभीर चर्चा हुई है, तब आम लोगों की तकलीफों पर फोकस हुआ है। महंगाई, बेरोजगारी और आम जन की दुर्दशा नैरेटिव में आई है....क्या इसकी कोई बड़ी भूमिका चुनाव परिणाम तय करने में होगी? सवाल इसलिए अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि, जैसाकि सीएसडीएस-लोकनीति के विश्लेषकों ने कहा है, आम मतदाता अपनी बढ़ती जा रही दुर्दशा से भलिभांति परिचित हैँ। सवाल यह है कि क्या वोट डालते वक्त उनका निर्णय इस दुर्दशा से प्रभावित हुआ है? सन् 2013 में जब नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व अपने हाथ में लिया और असाधारण आक्रामक अंदाज में...

  • मोदी की तपस्या, फल देंगे मतदाता

    तमाम अटकलों और कयासों के बावजूद यह मानने का कोई कारण नहीं है कि भाजपा के मत प्रतिशत या सीटों में कोई कमी होने जा रही है। पहले से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि भाजपा एक बार फिर बड़े बहुमत की सरकार बनाएगी और आखिरी चरण के मतदान के बाद आए एक्जिट पोल के अनुमानों ने इस धारणा की पुष्टि भी कर दी है। चार जून को एक बार फिर बड़े बहुमत से श्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने जा रही है। उनकी तीसरी पारी शुरू होने वाली है। एस. सुनील लोकसभा चुनाव 2024 के परिणाम आने वाले हैं।...

  • ‘ध्यान’ की पंचवर्षीय योजना का उपसंहार

    ‘ध्यान’ अगर ‘ध्यान’ है तो उसे मतदान के अंतिम चरण की पूर्व संध्या से शुरू कर मतदान ख़त्म होने पर ख़त्म करना ही क्यों ज़रूरी है? ध्यान अगर ‘ध्यान’ पर है और चुनाव पर नहीं तो फिर तो ‘ध्यान’ कभी भी, कहीं भी, किया जा सकता है। उस के लिए विवेकानंद शिला की ही क्यों ज़रूरत है, उस के जीवंत प्रसारण की क्यों ज़रूरत है, उसे मंचीय स्वरूप देने की क्यों ज़रूरत है? पांच बरस पहले केदारनाथ की गुफ़ा में बैठ कर भी अपने ‘ध्यान’ का जीवंत प्रसारण नरेंद्र भाई ने कराया था। .. नरेंद्र भाई के ‘ध्यान’ की यह...

  • सत्य बनाम सेंसर

    एक सब से बड़े भाजपा नेता ने गर्व से कहा कि उन्होंने लाखों-लाख ह्वाट्सएप ग्रुप बनवा रखे हैं, जिस से 'सच या झूठ को भी' वायरल करवा सकते हैं।‌ उन्होंने एक घृणित झूठ का उदाहरण दिया - फलाँ नेता ने अपने बाप को थप्पड़ मारा - जिसे उन के किसी चेले ने गढ़कर सनसनीखेज समाचार की तरह फैला दिया था! नेता के शब्दों में, ''काम तो है करने जैसा, मगर करना मत।'' उन्होंने दोहरा कर कहा, ''समझ में आता है? ये करने जैसा काम है, मगर करना मत।'' इस द्विअर्थी बोली में वे कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दे रहे थे। ह्वाट्सएप...

  • वोटों की गिनती पारदर्शिता से जरूरी

    देश के नामी वकील और सांविधानिक विशेषज्ञ कपिल सिब्बल ने एक प्रेस सम्मेलन बुलाकर सभी राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों से एक चेकलिस्ट जारी की। सिब्बल ने हर राजनैतिक दल और उनके मतदान/मतगणना एजेंटों के लिए आगामी 4 जून को आम चुनाव की गिनती से पहले जारी की गई इस चेकलिस्ट के माध्यम से यह समझाया है कि उन्हें कब क्या देखना है। सन् 2024 के लोकसभा चुनाव अपने अंतिम चरण तक पहुँच गये हैं। अब सभी को चुनावी एग्जिट पोल और 4 जून का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा। सभी यह देखना चाहेंगे कि विवादों में घिरी ‘ईवीएम’ अंत में किसकी...

  • कश्मीर घाटी में वर्षों बाद बैखोफ मतदान

    कश्मीर के लोगों को मतदान के लिए जैसे ही साफ व सुरक्षित माहौल मिला तो लोगों ने भी वोट डालने में कोई कंजूसी नही दिखाई। उस जगह भी खूब वोट पड़े यहां किसी ज़माने में चुनाव का पोस्टर लगाना भी संभव नही था। पिछले लोकसभा चुनाव में श्रीनगर के अंदरूनी इलाके के 70 मतदान केंद्रोंमें एक भी वोट नही डाला गया था।... इस बार श्रीनगर के हब्बाकदल विधानसभा क्षेत्र में भी 28.28 और ईदगाह में 26.81 प्रतिशत मतदान हुआ।...सोपोर विधानसभा क्षेत्र में इस दफा का कुल 44 प्रतिशत मतदान होना सबको हैरान कर गया। कश्मीर घाटी ने कई वर्षों बाद...

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