फुटबॉल विश्व कप: तीन सौ अरब डॉलर खर्च करके भी बदनामी!

बेचारा कतर! वह कतर जिस पर फुटबाल के कारण अभी वैश्विक निगाह है। दुनिया फुटबॉल देखेगी लेकिन उसका दिमाग कतर पर सोचेगा। वह भी निगेटिविटी में। क्यों?

राहुल की अपने पांवों फिर कुल्हाड़ी!

याद करें, एक-एक बात याद करें कि राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा शुरू करते हुए क्या मकसद बताए थे?  महंगाई, बेरोजगारी, बदहाली और परस्पर नफरत को लेकर जनता के बीच जाना।

राहुल ने गंवाई 48 सीटे!

ध्यान रहे सन् 2019 में कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली थी। अब तीन दिनों में दो बार सावरकर पर बोल कर राहुल ने शिवसेना और एनसीपी दोनों को बिदका डाला है।

वैचारिक मुद्दा कांग्रेस को ले डुबेगा!

जो मकसद बताया गया था उसकी चर्चा धीरे धीरे कम होती जा रही है। कांग्रेस बनाम भाजपा का वैचारिक टकराव, हिंदू बनाम सेकुलर का फर्क उभरता जा रहा है।

महाराष्ट्र में क्या चाहते हैं राहुल?

क्या कांग्रेस पार्टी के नेताओं को लग रहा है कि भारत जोड़ो यात्रा से ऐसा माहौल और ऐसी स्थिति बन गई हैं कि कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ कर जीत सकती है?

यात्रा के असली मुद्दे कहां चले गए?

राहुल गांधी ने जब भारत जोड़ो यात्रा शुरू की थी तब इसके कुछ उद्देश्य बताए गए थे। कांग्रेस के उद्देश्यों में नफरत की राजनीति को खत्म करके भारत को जोड़ने का एक मकसद था।

तीन अच्छी खबरें: पुतिन परास्त, ट्रंप रिजेक्ट और जोको मेजबान!

सत्य फिर जीतता हुआ है। जबकि झूठ, फ्रॉड और अहंकार हारते हुए। इसे समझना और देखना है तो यूक्रेन के खेरसॉन शहर की ताजा टीवी फुटेज देखें।

मोदी के गुजरात में केजरीवाल की अनहोनी!

गुजरात की हिंदू प्रयोगशाला में केजरीवाल ने यदि शहरों, शहरी सीटों में 15 से 25 प्रतिशत वोट भी पा लिया तो भाजपा को लेने के देने पड़ेंगे।

मोदी, केजरीवाल व राहुल की मेहनत और सवाल

हालांकि नरेंद्र मोदी की मेहनत सत्ता की सुख-सुविधाओं के साथ है। फिर भी वे सन् 2014 से अपनी उंगली पर भाजपा-संघ और भक्त हिंदुओं का जो गोवर्धन पर्वत उठाए हुए हैं वह कमाल की बात है।

मोदी क्यों करते हैं इतनी मेहनत?

भारत में चार ही प्रधानमंत्री ऐसे हुए, जिन्होंने प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा, उस सपने को पूरा करने की तैयारी में अपने को खपाया, दस तरह के जतन किए और सब्र के साथ प्रतीक्षा की।

पीएम बने ही वे चुनावी राजनीति के लिए!

नरेंद्र मोदी ने सन् 2013 में पीएम पद के दावेदार बनने से सियासी अभियान शुरू किया तो वह आज तक जस का तस चलता हुआ है। कोई विश्राम नहीं। दूसरे किसी को मौका नहीं।

मेहनत का केजरीवाल को फल

अवरिंद केजरीवाल ने दिल्ली में कांग्रेस को हरा कर उसका वोट और उसकी जगह दोनों हथियाई। दिल्ली में 15 साल कांग्रेस का राज रहा लेकिन केजरीवाल ने एक झटके में सीधे उसको रिप्लेस किया।

केजरीवाल महत्वाकांक्षा के धुनी!

आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल भी नरेंद्र मोदी की तरह मेहनत करते हैं। दोनों की राजनीति करने का तरीका भी एक जैसा है। दोनों एक जैसे ही साधनों का इस्तेमाल करते हैं।

राहुल की मेहनत मजबूरी में

मोदी प्रधानमंत्री बन गए हैं तो उनको पीएम के पद पर अनंतकाल तक बने रहना है वही केजरीवाल को प्रधानमंत्री पद हासिल करना है।

मेहनत से राहुल का बनेगा क्या?

कांग्रेस की यह यात्रा उतनी ही सामाजिक व सांस्कृतिक हैं, जितना राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ सामाजिक व सांस्कृतिक संगठन है। यह यात्रा पूरी तरह से राजनीतिक है।

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