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यही तो आशंका है

जेनरेटिव एआई से छात्र अवधारणाओं को बिना समझे असाइनमेंट पूरा कर लेते हैं। एआई पर निर्भरता उनके मानसिक प्रयास को कमजोर कर देती है। मगर जब एआई का सहारा नहीं रहता, तो वे पिछड़ जाते हैँ।

जो अब तक आशंका थी, उसकी पुष्टि अब ठोस अध्ययन से होने लगी है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस उपकरणों का इस्तेमाल बच्चे पढ़ाई-लिखाई में करने लगें, तो मानसिक क्रिया के जरिए सीखने और यादाश्त गहरी होने के मामले में वे पीछे रह जाएंगे। एक प्रॉम्प्ट से गणित के आम जोड़-घटाव, गुणा-भाग आदि के जवाब हाजिर हो जाएं, तो दिमागी गणना की क्षमता विकसित करने की जरूरत ही उन्हें महसूस नहीं होगी। यही बात सामान्य ज्ञान के अन्य क्षेत्रों पर भी लागू होती है। इसलिए जरूरी हो जाता है कि नीति निर्माता एवं अभिभावक इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बच्चों के मार्ग-निर्देशन के लिए विशेष प्रयास करें।

ब्रिटिश पत्रिका द इकॉनमिस्ट की एक रिपोर्ट में चीन में हुए एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन का हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक अल्पकाल में तो एआई का इस्तेमाल लाभदायक रहता है, लेकिन दीर्घकाल में यह नुकसान का सौदा बन जाता है। चीन में 12-18 वर्ष की उम्र के 27,000 छात्रों पर यह अध्ययन हुआ। इसमें पाया गया कि डीपसीक एवं अन्य एआई मॉडल्स का उपयोग करने से होमवर्क के अंकों में 18 प्रतिशत का सुधार हुआ। साथ ही असाइनमेंट पूरा करने का औसत समय 64 से घटकर 45 मिनट रह गया। लेकिन जब इम्तहान की बात आई, तो उन छात्रों को एआई पर निर्भर ना रहने वाले विद्यार्थियों की तुलना में 20 प्रतिशत कम अंक प्राप्त हुए।

अध्ययनकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जेनरेटिव एआई से छात्र अंतर्निहित अवधारणाओं को बिना समझे तेजी से असाइनमेंट पूरा कर लेते हैं। लेकिन जब एआई का सहारा नहीं रहता, तो वे पिछड़ जाते हैँ। यह ठीक है कि एआई से पहले भी शॉर्टकट मौजूद थे। छात्र होमवर्क पूरा करने में इंटरनेट की मदद लेते थे। तब भी परीक्षा में प्रदर्शन पर इसका असर पड़ता था। मगर एआई ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। इसलिए विशेषज्ञों की इस राय पर ध्यान देने की जरूरत है कि शॉर्टकट के लिए एआई पर निर्भरता उस मानसिक प्रयास (कॉग्निटिव एफर्ट) को कमजोर कर देती है, जो गहरे ज्ञान के लिए आवश्यक है। स्पष्टतः ऐसी निर्भरता से बच्चों को बचाना समाज की जिम्मेदारी है।

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