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एआईः भय या भाग्य?

भारत एआई क्रांति में अग्रणी तब होगा, जब उसका अपना लार्ज लैंग्वेज मॉडल होगा और उस पर आधारित प्लेटफॉर्म होंगे, जिनका इस्तेमाल भारत के लोगों के साथ साथ दुनिया के लोग भी करेंगे। अगर ऐसा नहीं होता है तो यहां भी हम सेक्टर स्पेशिफिक एप्लीकेशन बनाते रह जाएंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट-2026 के उद्घाटन भाषण में वैसे तो कई बातें कहीं लेकिन पूरे भाषण का सार यह है कि इसे भय के तौर पर देखा जाए या भाग्य के तौर पर। उन्होंने कहा कि कुछ लोग एआई को भय के तौर पर देख रहे हैं लेकिन भारत इसे भाग्य के तौर पर देख रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एआई ने पूरी दुनिया में अगर नई संभावनाओं के रास्ते खोले हैं तो भय भी पैदा किया है। भय इसलिए क्योंकि यह पहली संज्ञानात्मक क्रांति है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि कृत्रिम बुद्धि मनुष्य की बुद्धि को चुनौती दे रही है। मनुष्य जो काम नहीं कर पाता था या जो काम करने में उसे घंटों या महीनों का समय लगता था वह काम अब एआई के जरिए चुटकियों में हो रहा है। इसलिए इसे सिर्फ नौकरी के लिए खतरे के तौर पर नहीं देखा जा सकता है। यह सभ्यता, संस्कृति और समस्य मानवीय मूल्यों के लिए चुनौती की तरह है।

जहां तक इस संज्ञानात्मक क्रांति में भारत की स्थिति की बात है तो उसकी एक झलक इसी एआई इम्पैक्ट समिट में दिखाई दी। पहले दिन जिस तरह की अव्यवस्था हुई उसे लेकर सोशल मीडिया में खूब तंज किए गए। कहा गया कि एआई समिट में ही एआई का इस्तेमाल नहीं किया गया। इसके बाद एक यूनिवर्सिटी की ओर से चीन के रोबोडॉग और कोरिया के ड्रोन को अपना बना कर पेश करने की घटना हुई, जिसने भारत की क्षमताओं पर गंभीर सवाल खड़े किए। यह सही है कि उसे प्रतिनिधि घटना के तौर पर नहीं पेश किया जा सकता है लेकिन इस घटना ने एआई के सेक्टर में भारत की तैयारियों और उपलब्धियों को संदेह की नजर से देखने के लिए बाध्य किया है।

इस समिट में दुनिया भर के देशों के नेता या स्टार्टअप के फाउंडर्स या प्रौद्योगिकी के क्षेत्र की महाबली कंपनियों के प्रमुख भारत के बारे में क्या कहते हैं इससे कोई धारणा बनाने की जरुरत नहीं है। उनके लिए भारत एक बाजार है इसलिए वे बड़े बड़े निवेश के वादे कर रहे हैं या भारत की तारीफ कर रहे हैं। उनकी तारीफों के आधार पर भारत को अपना आकलन नहीं करना चाहिए। भारत को अपनी तैयारियों और उपलब्धियों का आकलन वस्तुनिष्ठ तरीके से करना चाहिए। भारत इसलिए एआई क्रांति में अग्रणी नहीं हो सकता है कि यहां ओपनएआई के प्लेटफॉर्म चैटजीपीटी के साढ़े 14 करोड़ यूजर्स हैं। भारत में तो फेसबुक के 45 करोड़ यूजर हैं लेकिन उससे भारत सोशल मीडिया क्रांति में अग्रणी नहीं हो गया है।

भारत एआई क्रांति में अग्रणी तब होगा, जब उसका अपना लार्ज लैंग्वेज मॉडल होगा और उस पर आधारित प्लेटफॉर्म होंगे, जिनका इस्तेमाल भारत के लोगों के साथ साथ दुनिया के लोग भी करेंगे। अगर ऐसा नहीं होता है तो यहां भी हम सेक्टर स्पेशिफिक एप्लीकेशन बनाते रह जाएंगे। सर्वम ने इसी समिट में लार्ज लैंग्वेज मॉडल पेश किया है। लेकिन उसकी कामयाबी तभी मानी जाएगी, जब भारत में करोड़ों लोग इसे इस्तेमाल करना शुरू करेंगे। जैसे चीन के डीपसीक ने चीन को लोगों की जरुरतें पूरी की कम से कम वैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म की भारत में जरुरत है। ध्यान रहे भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के तौर पर ‘कू’ और ऑफिस सूट के तौर पर ‘जोहो’ की चर्चा खूब हुई। लेकिन भारत के लोग इस्तेमाल अमेरिकी सोशल मीडिया और ऑफिस सूट ही करते हैं। अगर ऐसी स्थिति एआई में भी रही तो भारत इस क्रांति की बस भी मिस करेगा।

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