हितों के टकराव को रोकने के लिए यह नियम बनाया गया था। लेकिन अब अडानी समूह ने एयरलाइन क्षेत्र में उतरने की योजना बनाई है, तो वर्तमान सरकार प्रतिबंध पर पुनर्विचार के लिए तैयार हो गई है।
साल 2006 में जब तत्कालीन केंद्र सरकार ने दिल्ली और मुंबई हवाई अड्डों को निजी हाथ में देने का निर्णय लिया, तो उसके साथ यह नियम तय किया गया था कि एयरपोर्ट संचालक किसी कंपनी को विमान सेवा चलाने की इजाजत नहीं दी जाएगी। हितों के टकराव को रोकने के लिए तब ये नियम जरूरी समझा गया। लेकिन अब चूंकि अडानी समूह ने एयरलाइन क्षेत्र में उतरने की योजना बनाई है, तो वर्तमान सरकार इस प्रतिबंध पर पुनर्विचार करने को तैयार हो गई है। इससे एयरलाइन पर दबदबा कायम कर चुकीं कंपनियों का परेशान होना लाजिमी है। उनमें से एक- इंडिगो- के प्रबंध निदेशक राहुल भाटिया ने सरकार के बदलते रुख पर खुलेआम एतराज जताया है।
उनका तर्क है कि जब एक ही समूह हवाई अड्डे का संचालन करता हो और एयरलाइन भी चलाता हो, तो स्लॉट आवंटन, पार्किंग बे, टर्मिनल एक्सेस, और एयरपोर्ट शुल्कों में उसकी एयरलाइन को तरजीह मिलने की आशंका रहती है। उन्होंने कहा कि दुनिया में ऐसा कोई बड़ा उदाहरण नहीं है, जहां एयरपोर्ट ऑपरेटर को एयरलाइंस चलाने या उनमें बड़ी हिस्सेदारी रखने की छूट हो। उनके मुताबिक दीर्घकाल में यह व्यवस्था प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करेगी, जिसका नुकसान अंततः हवाई यात्रियों को ही होगा। दरअसल, इन्हीं बातों के मद्देनजर 20 साल पहले उपरोक्त नियम बना था।
लेकिन आज दौर अलग है। यह सोचना भी कठिन है कि अडानी समूह कुछ करना चाहे और वर्तमान सरकार उसमें सहायक ना बने! बहरहाल, यह इस मसले का सिर्फ एक पहलू है। दूसरा पहलू एयरलाइन क्षेत्र में पहले ही कायम हो चुका द्वि-अधिकार (ड्यूओपॉली) है। इसका खामियाजा भारतीय विमान यात्री लगातार भुगत रहे हैं। अडानी समूह को इजाजत मिली, तो यात्रियों को तो शायद ही कोई राहत मिले- हां, उससे कॉरपोरेट टकराव जरूर खड़ा होगा। किंगफिशर, जेट एयरवेज, गो एयर आदि जैसी अनेक एयरलाइंस ढह गईं, तो वजह इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और सीमित उपभोक्ता आधार है। अडानी जैसे बड़े ग्रुप के आने से इंडिगो और एयर इंडिया के मुनाफे में जरूर सेंध लगेगी। मगर उससे कारोबार संकेंद्रण के दुष्परिणामों से त्रस्त यात्रियों को राहत मिलने की शायद ही कोई संभावना है।
