ब्रिक्स+ के जरिए विकासशील देशों में आपसी सहयोग की जमीन तैयार हुई है, इसकी पुष्टि नई दिल्ली में हुई। यह भी जाहिर हुआ कि भारत और चीन के संबंध में सुधार ब्रिक्स+ की प्रगति के लिए अनिवार्य है।
साझा बयान पर सहमति बन जाना ब्रिक्स+ के 18वें शिखर सम्मेलन की बड़ी कामयाबी रही। इसका काफी श्रेय मेजबान भारत को दिया जाएगा। पश्चिम एशिया के युद्ध में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को एक वक्तव्य पर सहमत कर लेना भारतीय कूटनीति की सफलता मानी जाएगी। कहा जा सकता है कि ब्रिक्स+ के नई दिल्ली घोषणापत्र की भाषा नरम है, जिसमें ठोस मुद्दों पर अक्सर प्रत्यक्ष उल्लेख से बचा गया है। फिर भी इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि वक्तव्य में ब्रिक्स+ की सोच, दिशा, और मकसद का विस्तार से जिक्र
हुआ।
एकतरफा जबरिया कार्रवाई की निंदा, टैरिफ के जरिए मुक्त व्यापार विरोधी कदम की आलोचना, गज़ा में फिलस्तीनियों के बेदखली का विरोध, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में सुधार का समर्थन, आपसी कारोबार अपनी मुद्रा में करने का इरादा, और विकासशील देशों के बीच सहयोग आदि का स्पष्ट उल्लेख कर ब्रिक्स+ देशों ने साफ संदेश दिया कि मौजूदा वैश्विक परिस्थिति में वे कहां खड़े हैं। ब्रिक्स+ के न्यू डेवलपमेंट बैंक को और मजबूत करने और सदस्य देशों में विकास परियोजनाओं उसकी सहायक भूमिका बढ़ाने पर बनी सहमति का दूरगामी अर्थ है। दरअसल, इसी तरह की पहल के जरिए ब्रिक्स+ वर्तमान विश्व व्यवस्था के समानांतर गरीब एवं विकासशील देशों के बीच ठोस एवं भौतिक सहयोग की जमीन तैयार कर रहा है।
चूंकि इस समूह में शामिल देशों के बीच कोई विचारधारात्मक या रणनीतिक साझापन नहीं है, अतः कई बार उनका एक दूसरे के हितों के खिलाफ काम करते दिखना और उस कारण ब्रिक्स+ के ठहराव का शिकार हो जाना सामान्य बात है। इसके बावजूद इस समूह के जरिए गुजरे दो दशकों में आर्थिक, वित्तीय एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए आपसी सहयोग की जमीन तैयार हुई है, इसकी पुष्टि नई दिल्ली में हुई। यहां यह भी जाहिर हुआ कि भारत और चीन के बीच तनाव का घटना ब्रिक्स+ की प्रगति की एक प्रमुख शर्त है। चूंकि हाल में ऐसा होता नजर आया है, इसलिए मंडराती तमाम आशंकाओं के बावजूद नई दिल्ली शिखर सम्मेलन इस समूह के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मुकाम बना। यह इसके लिए आशाजनक संकेत है।
