मूडीज का जनसंख्या विमर्श इस लिहाज से उपयोगी है कि इससे फिर ध्यान इस ओर गया है, लेकिन यह एकांगी है क्योंकि मूडीज ने विकसित देशों की कसौटियां भारत पर लागू करने की कोशिश की हैं।
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की जनसंख्या संचरना में आ रहे बदलाव का उपयोगी, लेकिन एकांगी विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यह उपयोगी इस लिहाज से है कि इससे फिर देश का ध्यान इस रुझान की तरफ गया है, लेकिन यह एकांगी है क्योंकि मूडीज ने सुझाव देते वक्त विकसित देशों की कसौटी भारत पर लागू करने की कोशिश की है। उसने ध्यान दिलाया है कि भारत की प्रजनन दर अब अपेक्षित प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे गिर चुकी है। इस कारण आने वाले दशकों में भारत की आबादी तेजी से बुढ़ापे की ओर बढ़ेगी। फिलहाल आबादी अपेक्षाकृत युवा है, लेकिन देश के जनसांख्यिकीय ढांचे में बदलाव शुरू हो चुका है। इस तरह भारत अब उसी रास्ते पर है, जिस पर यूरोप और पूर्वी एशिया के देश पहले पहुंच चुके हैं।
बहरहाल, इसके बाद मूडीज ने जो कहा है, वे घिसी-पिटी बातें हैं। मसलन, उसके मुताबिक आबादी के उम्रदराज होने से कामकाजी लोगों की संख्या में वृद्धि दर धीमी होगी, जिससे कुल आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है। कम कामकाजी लोगों पर अधिक संख्या में रिटायर्ड हो चुके बुजुर्गों को संभालने का बोझ बढ़ेगा, जिससे सरकारी खजाने, पेंशन प्रणाली, और स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा। उधर उपभोक्ता बाजार में मांग घटने की समस्या आएगी। लोगों के बूढ़े होने से देश में बचत, निवेश, और वित्तीय बाजारों के ढांचे में बड़ा बदलाव आएगा।
मगर ये बातें उन देशों में अधिक प्रासंगिक मालूम पड़ेंगी, जो अपनी श्रम शक्ति का पूरा उपयोग कर पा रहे हों। साथ ही जहां सामाजिक सुरक्षा का दुरुस्त इंतजाम हो। भारत कथित डेमोग्राफिक डिविडेंड (युवा आबादी के लाभ) के दौर में भी अपने कुशल एवं शिक्षित युवा हाथों को काम मुहैया करा पाने में नाकाम रहा है। इस कारण आबादी की तुलना में यहां का उपभोक्ता बाजार सीमित बना हुआ है, जो हाल के वर्षों में और अधिक असंतुलित हो गया है। देश में सामाजिक सुरक्षा व्यक्तियों की अपनी पूर्व योजना या फिर कैश ट्रांसफर के जरिए “वोट खरीद योजनाओं” पर निर्भर हैं। इन हकीकतों के बीच आबादी के पश्चिमी विमर्श की यहां न्यूनतम प्रासंगिकता ही है।
