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लाठी और आंसू गैस

कॉकरोचोंको थका देने या उनके आंदोलन में पाकिस्तान या चीन के हाथजैसे नैरेटिव्स के प्रचार से असली सवाल खत्म नहीं होंगे। बल्कि ऐसी सोच से ये प्रश्न व्यवस्था से मोहभंग का कारण बन सकते हैं।

पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था की खामियों के लिए जवाबदेही की मांग करने राजधानी आए छात्र-नौजवानों का बड़ा हिस्सा यह देखकर भौंचक था कि “जो पुलिस उनके लिए है”, वही उन पर बेरहमी से लाठी क्यों चला रही है? उनकी बात सुनने के बजाय उन पर आंसू गैस के गोले क्यों दागे जा रहे हैं? किशोर वय छात्र-छात्राएं इस सवाल में उलझे नजर आए कि लोकतंत्र में अपनी बात कहने से उन्हें क्यों रोका जा रहा है? “इतना सब कुछ हो चुकने” के बावजूद किसी को जवाबदेह क्यों नहीं बनाया गया है? उन्हें यह देखकर भी हैरत हुई कि जब राज्यसभा में विपक्ष के नेता ने उनकी बात और उन पर पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाने की कोशिश की, तो मिनट भर के अंदर सदन को ही स्थगित कर दिया गया।

इससे सवाल उठा कि संसद छात्र-नौजवान या जन समुदाय के किसी अन्य हिस्से को चिंताओं को व्यक्त और उन पर विचार-विमर्श का मंच अगर नहीं रह गई है, तो फिर पाठ्यपुस्तकों के जरिए प्रातिनिधिक लोकतंत्र के पढ़ाए गए तमाम गुण क्या महज किताबी हैं? अलग-अलग राज्यों के छोटे-बड़े शहरों में दिल्ली की घटनाओं के खिलाफ हुए स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शनों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये सवाल दूर-दराज तक पहुंच गए हैं। ‘कॉकरोचों’ को थका देने या उनके आंदोलन में “पाकिस्तान या चीन के हाथ” जैसे नैरेटिव्स के प्रचार से ये सवाल खत्म नहीं होंगे। बल्कि ऐसी सोच से ये प्रश्न व्यवस्था से गहरे मोहभंग का कारण बन सकते हैं।

इसलिए सत्ता पक्ष को जन असंतोष से निपटने के पुराने तौर-तरीकों से बाहर निकलना चाहिए। दिल्ली में युवाओं की जैसी अप्रत्याशित भीड़ उमड़ी, वह संकेत है कि वो तौर-तरीके अब तेजी से असर खो रहे हैं। इसलिए असल सवालों से आंख मिलाने की जरूरत है। शिक्षा, अर्थव्यवस्था, एवं सामाजिक माहौल की परत-दर-परत दरकती ईंटों ने वो हालत पैदा की है, जिसमें छात्र-नौजवानों के सामने अवसरहीनता की विकट स्थिति खड़ी हुई है और उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा है। उसी से उपजी हताशा का प्रतीकात्मक विस्फोट दिल्ली की सड़कों पर हुआ- इसे समझने की जरूरत है।

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