चुनावी लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व के मूलभूत सिद्धांत को लेकर विपक्ष इतना आशंकित क्यों है? ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उसके अंदेशे निराधार हैं। मगर समस्याएं कहीं और हैं। उनके आधार पर बुनियादी सिद्धांत की अनदेखी गलत कदम होगा।
विधायिका में महिला आरक्षण के लिए संसद के बुलाए गए विशेष सत्र में संभवतः लोकसभा सीटों के परिसीमन से संबंधित विधेयक भी पारित किया जाएगा। केंद्र हर राज्य की मौजूदा सीट को डेढ़ गुना कर देने के फॉर्मूले पर आगे बढ़ता दिख रहा है। मगर इस फॉर्मूले के तर्क को समझना मुश्किल है। संसदीय लोकतंत्र में निम्न सदन की सीटें जनसंख्या के अनुपात में तय होती हैं। परिसीमन भी इसी सिद्धांत से होना चाहिए। मगर अपना सियासी प्रभाव घटने की दक्षिणी राज्यों की आशंका के समाधान के तौर पर केंद्र ने एकरूप फॉर्मूला निकाला है। मगर इससे कोई उद्देश्य हासिल नहीं होगा।
दक्षिण की पार्टियां यह कहते हुए इस फॉर्मूले का विरोध कर रही हैं कि इससे उत्तरी राज्यों और उनकी लोकसभा सीटों की संख्या में फासला और बढ़ जाएगा। कांग्रेस भी अपनी राजनीतिक गणना के तहत इस दलील के साथ खड़ी है। अतः ये सवाल अहम हो जाता है कि आखिर चुनावी लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व के मूलभूत सिद्धांत को लेकर विपक्ष इतना आशंकित क्यों है? ऐसा नहीं कहा जा सकता कि ये अंदेशे निराधार हैं। मगर उनकी जड़ें नरेंद्र मोदी सरकार के संवाद और सहमति को ठुकराने और अपनी सोच को बुल्डोजरी तरीके से लागू करने में छिपी हैं। केंद्र ने राष्ट्रीय विकास परिषद एवं राष्ट्रीय एकता परिषद जैसे संवाद के मंचों को समाप्त कर दिया है।
बाकी संस्थाओं को नियंत्रित करने की उसकी कोशिशों ने उससे असहमत तबकों और क्षेत्रों में विपरीत भावनाएं पैदा की हैं। उनका असर परिसीमन से जुड़ी बहस पर देखा गया है। संसद का सत्र भी बिना आम-सहमति बनाए उस समय बुलाया गया है, जब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव का प्रचार चरम पर होगा। स्पष्टतः वहां के सांसदों के लिए इससे मुश्किल खड़ी होगी। मगर, इस पृष्ठभूमि के कारण प्रतिनिधित्व के बुनियादी सिद्धांत की अनदेखी गलत परिपाटी को जन्म देगी। परिपक्व लोकतांत्रिक देशों में जनता के सदन को संतुलित करने के लिए अधिकार-प्राप्त उच्च सदन की व्यवस्था की गई है। भारत में ये व्यवस्था आंशिक रूप से ही कारगर है। बहरहाल, समस्या जहां है, उससे कहीं अलग हल ढूंढना नई समस्याओं को जन्म देगा।
