तो सवाल उठेगा कि निर्वाचन आयोग ने आम जन और विपक्ष के मन से संदेह दूर करने का क्या प्रयास किया है? जब कभी ऐसे सवाल उठे, आयोग ने उनके प्रति लापरवाह रुख क्यों अपनाया?
कम-से-कम इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के मामले में निर्वाचन आयोग इससे अवगत है कि इनको लेकर आम लोगों के मन में कई सवाल हैं। यह बात खुद आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कही है। मुद्दा ईवीएम वोटों की गिनती में ‘टोटलाइजर’ के इस्तेमाल का है। एक जन हित याचिका में इसके उपयोग का निर्देश देने की गुजारिश की गई है। टोटलाइजर मशीन पोलिंग बूथों की ईवीएम कंट्रोल इकाइयों को जोड़कर वोटों की समग्र गिनती कर देती है। यानी बूथों की अलग-अलग गिनती की जरूरत नहीं पड़ती। इस पर अपना पक्ष रखते हुए आयोग ने कहा- ‘यह कहना प्रासंगिक होगा कि जिस समय ईवीएम की कार्य-पद्धति और साख पर बार-बार सार्वजनिक प्रश्न उठाए जा रहे हैं, टोटलाइजर जैसी नई और अब तक अविनियमित मशीन को जोड़ने से नए आरोप और नए विवाद खड़े हो सकते हैं।’ तो सवाल उठेगा कि यह अहसास होने के बावजूद आयोग ने आम जन और विपक्ष के मन से संदेह दूर करने का क्या प्रयास किया है?
जब कभी ऐसे सवाल उठाए गए, आयोग ने उनके प्रति लापरवाही का इजहार क्यों किया? और बात सिर्फ ईवीएम की नहीं है। साख के उससे भी बड़े प्रश्न मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के क्रम में उठे हैं। महाराष्ट्र की जारी नई ड्राफ्ट सूची का उल्लेख करते हुए लोकसभा में विपक्ष के नेता ने पूछा है- ‘अब महाराष्ट्र में 2.07 करोड़ मतदाताओं को ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर कर दिया गया है- यानी हर पांचवां वोटर। लोकसभा 2024: 9.29 करोड़। विधानसभा 2024: 9.7 करोड़। एसआईआर 2026: 7.78 करोड़। कौन-सी लिस्ट सही थी?’ राहुल गांधी ने जवाब दिया- ‘मैंने तब भी कहा था, आज भी कहता हूं: यह वोट चोरी थी।’ उन्होंने ध्यान दिलाया कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर में जिन नामों को काटा गया, उनमें से 91 प्रतिशत नाम अपील के बाद वापस जोड़ने पड़े। बहरहाल, इस बीच विधानसभा चुनाव हो चुका था! यानी बात सिर्फ सवाल और संदेह की नहीं है। विपक्ष का सीधा आरोप “वोट चोरी” का है। क्या ये आयोग की जवाबदेही नहीं है कि उचित स्पष्टीकरण पेश कर वह सबका भरोसा हासिल करने के प्रयास करे?
