निर्वाचन आयोग को विपक्षी दलों को आमंत्रित कर उनकी शिकायतों पर ध्यान देना चाहिए। मंगलवार को जब विपक्षी सांसद विरोध जताने निर्वाचन आयोग जाएंगे, तो वह उनसे संवाद शुरू करने का माकूल मौका होगा।
लोगों का असंतोष फिर से सड़कों पर उबल रहा है। इस बार मुद्दा राजनीतिक है। नई दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर मुंबई के शिवाजी पार्क और देश के अन्य हिस्सों में हुए विरोध प्रदर्शनों का संदेश है कि जनमत के एक बड़े हिस्से में चुनाव प्रक्रिया के स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रहने का भरोसा नहीं रहा। यह चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि ऐसी धारणाएं निर्वाचित सरकार की वैधता पर सवाल उठाने तक चली जाती हैं। भारत में यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बनने लगी है, जब विपक्ष और सिविल सोसायटी के एक हिस्से में हाल में हुए चुनावों के परिणाम पर खुलेआम संदेह जताया जा रहा है। कुछ राजनेताओं ने 2024 के चुनाव परिणाम पर भी सवाल उठाए हैं।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से संबंधित विवाद पर जैसा विरोध भड़का है, वह संकेत है कि इन सवालों और संदेहों का प्रभाव दूर तक चला गया है। सरकार के कर्ता-धर्ताओं में दूरदर्शिता होती को बन रहे हालात का मतलब समझते हुए वे उचित पहल करते। कहा जा सकता है कि ऐसा ना कर वे देश की राजनीतिक व्यवस्था के लिए चुनौतियां बढ़ा रहे हैं। केंद्र और निर्वाचन आयोग चाहें, तो अभी भी बहुत देर नहीं हुई है। उन्हें यह उचित सलाह होगी कि वे चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता बहाल करने की पहल तुरंत करें। इसकी शुरुआत ऐसी सर्वदलीय बैठक बुलाकर की जा सकती है, जो महज रस्म-अदायगी ना हो।
उधर निर्वाचन आयोग को विपक्षी दलों को आमंत्रित कर उनकी शिकायतों पर ध्यान देना चाहिए। मंगलवार को जब इंडिया गठबंधन के सांसद विरोध जताने निर्वाचन आयोग की ओर जाएंगे, तो वह इस प्रक्रिया को शुरू करने का माकूल मौका होगा। आयोग ने एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से निकाले गए वैध मतदाताओं के नाम वापस शामिल करने के अभियान की घोषणा कर उचित कदम उठाया है। अब उसे विपक्षी खेमों की अन्य मांगों भी पर ठोस कदम उठाना चाहिए। उधर केंद्र को निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश मुताबिक करने के लिए कानून में उचित बदलाव लाना चाहिए। सिर्फ ऐसे कदमों से ही देश को राजनीतिक अस्थिरता से बचाया जा सकेगा।
