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हंसता मुखड़ा, रोता अंतरा!

संक्षेप देखकर ठहर जाएं, तो मालूम होगा कि श्रम बल में भागीदारी बढ़ी है और बेरोजगारी दर घटी है। लेकिन बारीकी में जाएं, तो सकारात्मक कथानक में मौजूद कई गंभीर कमियां उजागर होने लगती हैं।

दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में रोजगार की स्थिति पर राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन (एनएसओ) की ताजा रिपोर्ट चमकती हेडलाइन के लिए मसाला तो देती है, लेकिन उसके अंदर उतरते ही कड़वी हकीकतों से सामना होने लगता है। सिर्फ सार-संक्षेप देखकर ठहर जाएं, तो मालूम होगा कि श्रम बल में महिलाओं सहित कामकाजी उम्र के सभी व्यक्तियों की भागीदारी बढ़ी है और बेरोजगारी दर घटी है। लेकिन बारीकी में जाएं, तो सकारात्मक कथानक में मौजूद कई गंभीर कमियां जाहिर होने लगती हैं। मसलन, यह उत्साह से बताया गया है कि बड़े शहरों में 55 फीसदी से अधिक श्रमिक अब नियमित वेतनभोगी हैं। मगर रिपोर्ट में यह तथ्य भी मौजूद है कि इनमें बहुत बड़ा हिस्सा वैसी “नियमित” नौकरियों का है, जिनमें पीएफ, पेंशन, सवैतनिक अवकाश, या स्वास्थ्य बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षाएं नहीं मिलतीं। गिग कर्मियों की बढ़ती संख्या को रोजगार वृद्धि बताया गया है, जबकि ऐसे कर्मियों को किसी तरह के श्रम अधिकार या जॉब सिक्योरिटी हासिल नहीं हैं।

महिला श्रम बल भागीदारी बढ़ कर 27.2 फीसदी होने का दावा भी विवादास्पद है, क्योंकि खुद रिपोर्ट मानती है कि कामकाजी महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा आज भी कम या शून्य वेतन वाले घरेलू कार्यों या असंगठित मैन्युफैक्चरिंग में लगा हुआ है। महिलाओं को पुरुषों की तुलना में काफी कम वेतन मिलता है, यह स्वीकार किया गया है। बेरोजगारी दर गिर कर 4.9 प्रतिशत रह जाने की बात कही गई है, लेकिन अर्ध-रोजगार या योग्यता से कम दर्जे का काम मिलने के व्यापक चलन पर रिपोर्ट चुप है। दुर्भाग्यपूर्ण हकीकत यह है कि लाखों पोस्ट-ग्रेजुएट और इंजीनियरिंग डिग्री धारक युवा फिलहाल महानगरों में क्लर्क, डिलीवरी बॉय या डेटा एंट्री ऑपरेटर की नौकरी करने को मजबूर हैं। फिर याद रखना चाहिए कि ये रिपोर्ट मिलियन-प्लस शहरों के बारे में है। छोटे शहरों और ग्रामीण भारत की कहानी इसमें शामिल नहीं है, जहां महानगरों की तुलना में काफी कम कमाई होती है। तो एक बार फिर वही कहानी है। रोजगार के मोर्चे पर नीतिगत विफलता को छिपाने के लिए एक रिपोर्ट को इस इस तरह लिखा गया है, जिससे लोग ‘फील-गुड’ महसूस करें।

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