आरबीआई ने विदेशी मुद्रा बाजार से संबंधित नियमों फेरबदल की है। लेकिन इससे रुपये को स्थायी मजबूती नहीं मिल पाएगी। रुपया अर्थव्यवस्था की मूलभूत कमजोरियों और वैश्विक वित्तीय संकट के कारण गिर रहा है।
पिछले महीने विदेशी खाता अनिवासी बैंक जमा (एफसीएनआर) योजना के तहत 127 बिलियन डॉलर भारत आने पर रुपये का संकट हल हो जाने का भरोसा बंधाया गया था। इतनी रकम आने से डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत की गिरावट पर तात्कालिक रोक लगी। यह दीगर है कि इस जमा योजना के मैच्योर होने पर अगले तीन से पांच साल में बड़े पैमाने पर डॉलर बाहर जाएगा, जिससे तब विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा। बहरहाल, एफसीएनआर योजना रुपये को महीना भर भी सहारा नहीं दे सकी। पिछले कुछ दिनों में फिर से रुपये के भाव में गिरावट आने लगी है।
तो अब भारतीय रिजर्व बैंक ने नए ‘बैंड एड’ लगाए हैं। इसके तहत डेरिवेटिव्स समेत विदेशी मुद्रा कारोबार पर कुछ पाबंदियां लागू की गई हैं, डॉलर में लेन-देन पर न्यूनतम भंडार रखने की शर्त लगाई गई है, तेल मार्केटिंग कंपनियों के कच्चे तेल के बदले भुगतान के लिए विशेष व्यवस्था शुरू की गई है, और कंपनियों को कहा गया है कि डॉलर में भुगतान की स्थिति में अपने फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट को रद्द ना करें। मकसद है कि रुपया मौजूदा स्तर से ज्यादा तेजी से ना गिरे। इसके पहले लगातार खबरें आईं कि रुपये की कीमत को संभालने के लिए रिजर्व बैंक रोजमर्रा के स्तर पर अपने भंडार से बड़ी मात्रा में डॉलर बेच रहा है। लेकिन यह मुद्रा की कीमत को संभालने का कृत्रिम तरीका है, जिसे अनिश्चित-काल तक जारी नहीं रखा जा सकता।
अब आरबीआई ने विदेशी मुद्रा बाजार से संबंधित नियमों फेरबदल की पहल की है। लेकिन यह भी तकनीकी कदम ही है। यह रुपये को स्थायी मजबूती मिलने की गारंटी नहीं है। वजह यह है कि रुपये की कीमत भारतीय अर्थव्यवस्था की मूलभूत कमजोरियों और बढ़ते जा रहे वैश्विक वित्तीय संकट के कारण गिर रही है। सबसे बड़ा कारण अमेरिकी बॉन्ड पर बढ़ती ब्याज दर है, जिससे निवेशक भारत जैसे बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिका ले जा रहे हैं। इसके अलावा ईरान युद्ध के कारण तेल, उर्वरक, केमिकल्स आदि की महंगाई से बने हालात लगातार अधिक गंभीर हुए हैँ। इन मुश्किलों का इलाज बैंड-एड से नहीं हो सकता।
