Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

हौव्वा ही साबित हुए!

अंतरराष्ट्रीय अवसरों का लाभ उठाने के लिए भी जरूरी है कि देशी अर्थव्यवस्था में निवेश एवं प्रतिस्पर्धा के अनुकूल स्थितियां हों। इसके अभाव में ना संरक्षणवाद काम आया है, और ना खुले व्यापार का रास्ता!

एक के बाद एक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) करना तीसरे कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार की प्राथमिकता रही है। इनसे धारणा बनाई गई कि अब उन समस्याओं का हल निकल आएगा, जिन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को घेरे रखा है। लेकिन मशहूर अमेरिकी थिंक टैंक- सेंटर फॉर इंटरनेशनल एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज (सीएसआईएस) के एक अध्ययन पत्र का निष्कर्ष है कि ये समझौते भारत के व्यापार ढांचे या मैनुफैक्चरिंग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने में नाकाम रहे हैं। जिन देशों या देश समूहों के साथ करार हुए, उनसे भारत का द्विपक्षीय व्यापार जरूर बढ़ा है, लेकिन निर्यात आधारित विकास की महत्त्वाकांक्षा को पूरी करने में इनका कोई खास योगदान बनता नहीं दिखता।

पत्र में जोर दिया गया है कि भूमि, श्रम, बिजली और जल की आपूर्ति, और विवादों के कुशल न्यायिक समाधान से संबंधित चुनौतियां बनी हुई हैं। दस्तावेज की दलील है कि इन बिंदुओं पर प्रगति के बिना भारतीय कंपनियां अपेक्षित प्रतिस्पर्धा क्षमता हासिल नहीं कर सकेंगी, जिससे वे एफटीए से मिले बाजार अवसरों का पूरा लाभ उठा सकें। इसमें ध्यान दिलाया गया है कि सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ योजना के तहत संरक्षणवाद को तरजीह दी। इसके तहत शुल्क और गैर शुल्क रुकावटें खड़ी कर घरेलू उत्पादकों को संरक्षण दिया गया। लेकिन इस योजना के परिणाम निराशाजनक रहे। भारतीय जीडीपी में मैनुफैक्चरिंग का योगदान 13-15 प्रतिशत के बीच बना रहा।

तब मोदी सरकार ने एफटीए की नीति अपनाई। इस दौरान यूएई, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन, ओमान, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और यूरेपियन यूनियन से एफटीए करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए गए। लेकिन इन समझौतों से अपेक्षित लाभ प्राप्त होते नहीं दिख रहे हैं। इस दौरान एक और मुश्किल अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के संरक्षणवादी नीति अपनाने लेने से पेश आई है। इससे पूरी दुनिया का व्यापारिक माहौल बिगड़ गया है। बहरहाल, महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय अवसरों का लाभ उठाने के लिए भी यह जरूरी है कि देशी अर्थव्यवस्था में निवेश एवं प्रतिस्पर्धा के लिए अनुकूल स्थितियां हों। इसके अभाव में ना तो संरक्षणवाद काम आया है, और ना ही खुले व्यापार का रास्ता!

Exit mobile version