इच्छा-मृत्यु की प्रक्रिया को संपन्न कराने के लिए अस्पताल अब अधिकृत हो जाएंगे। मगर प्रक्रिया की शुरुआत तभी होगी, जब मरीज के “सर्वोत्तम हित में” विस्तृत मेडिकल समीक्षा कर ली गई होगी। इस तरह इच्छा-मृत्यु का एक कायदा तय हो गया है।
अचेतावस्था में पड़े व्यक्ति की चेतना वापस आने की आस टूट गई हो, तो मेडिकल उपकरणों से सहारे उस व्यक्ति की सांस चलाते रखने का प्रयास कब तक किया जाना चाहिए? डॉक्टर हथियार डाल चुके हों, उसके बावजूद मानसिक रूप मृत, लेकिन शारीरिक रूप से जीवित ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति किस हद तक वांछित है? ये बड़े बुनियादी किस्म के सवाल हैं, जो कुछ खास मामलों में हर आधुनिक समाज के सामने उपस्थित होते रहे हैं। इन सवालों के साथ धार्मिक, रिवायती और सामाजिक प्रश्न जुड़े रहते हैं। इसे स्वीकार कर लेने के बावजूद कि उनका प्रिय व्यक्ति अब सचेत नहीं हो पाएगा, भावनात्मक लगाव, एवं कई बार ‘लोग क्या कहेंगे’ जैसे सामाजिक दबाव के कारण परिवार पीड़ित की मृत्यु के इंतजार में बैठा रहता है।
यह ऐसी पीड़ा है, जिसमें अचेतावस्था में पड़े व्यक्ति के साथ-साथ पूरा परिवार लंबे समय तक झूलता रहता है। एक ऐसे ही मामले में अब सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण मेडिकल देखरेख में इच्छा-मृत्यु की इजाजत दी है। अशोक राणा अगस्त 2013 में पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल से गिरने के बाद से अचेतावस्था में पड़े हुए हैं। 12 साल से जारी उनकी पीड़ा से आजिज़ परिवार ने सर्वोच्च न्यायालय से इच्छा-मृत्यु प्रदान करने की अनुमति मांगी। भारत में यह ऐसा पहला मामला नहीं है, मगर इस बार कोर्ट ने ऐसे मामलों के लिए प्रतिमान तय किया है। कहा है कि ऐसी प्रक्रिया पूर्ण चिकित्सकीय योजना के साथ संपन्न की जानी चाहिए।
चिकित्सा उपकरणों को हटाने के दौरान मरीज को पीड़ा से बचाना और यह सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा कि इसका अर्थ मरीज से पल्ला झाड़ना ना समझा जाए। अशोक राणा के मामले यह प्रक्रिया नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान में पूरी की जाएगी। इसके बाद ऐसी प्रक्रिया को संपन्न कराने के लिए मरीज की भर्ती के लिए अस्पताल अधिकृत हो जाएंगे। मगर प्रक्रिया की शुरुआत तभी की जा सकेगी, जब मरीज के “सर्वोत्तम हित में” उसकी विस्तृत मेडिकल समीक्षा कराई जा चुकी होगी। इस तरह इच्छा-मृत्यु का एक कायदा तय हो गया है। बेहतर होगा, संसद इसकी रोशनी में विस्तृत वैधानिक प्रावधान कर दे।
