Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

चौड़ी होती हुई खाई

आरोप और विवादों का हल संवैधानिक माध्यमों से नहीं ढूंढा जाएगा या एक पक्ष का इन तरीकों में भरोसा लगातार घटता चला जाएगा, तो फिर पैदा हुए गतिरोध का हल किस रास्ते से निकलेगा?

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया एलायंस के महाभियोग के अभिनय और उसके बाद नई दिल्ली में “वोट चोरी” के खिलाफ विशाल रैली का संदेश है कि यही अब विपक्ष का प्रमुख मुद्दा है। दोनों कार्यक्रमों में साफ कहा गया कि 2024 का आम चुनाव “चुरा” लिया गया, इसलिए नरेंद्र मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल अवैध है। यह बेहद संगीन इल्जाम है, जिसके बेहद गंभीर और दूरगामी नतीजे हो सकते हैं। उधर इस विपक्षी मुहिम के खिलाफ सत्ताधारी भाजपा भी सड़क पर उतरी है। उसने अपने अभियान का नाम- ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ रखा है।

इसमें “अराजकता” शब्द महत्त्वपूर्ण है। भाजपा का आरोप है कि विपक्ष देश को अराजकता की ओर ले जा रहा है। बहरहाल, इस सूरत के लिए कौन जिम्मेदार है, इस पर भले बहस की गुंजाइश हो, लेकिन दोनों पक्षों का रुख जिस तरह सख्त हो रहा है और उनके बीच संवाद की गुंजाइश घट रही है, उससे अराजक स्थिति बनने की आशंका निर्विवाद रूप से बढ़ी है।

अगर आरोप और विवादों का हल संवैधानिक माध्यमों से नहीं ढूंढा जाएगा या एक पक्ष का इन तरीकों में भरोसा लगातार घटता चला जाएगा, तो फिर पैदा हुए गतिरोध का हल किस रास्ते से निकलेगा? इस प्रश्न को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राजनीतिक दलों को उस पर गहन आत्म-निरीक्षण करना चाहिए। गौर करने की बात है कि जन समर्थन दोनों ही तरफ है। बेशक भाजपा के पक्ष में बड़ा जनमत है, लेकिन बीते चुनाव नतीजों पर भी गौर करें, तो यह साफ है कि विपक्ष भी जनमत के कम-से-कम आधे हिस्से की नुमाइंदगी करता है। ऐसे मत विभाजन के बीच सर्वमान्य प्रक्रियाएं और उन पर अमल कराने वाली संस्थाएं ही वे माध्यम होती हैं, जिनके आधार पर लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम रहती है। वैसे तो सिलसिला लंबा हो चुका है, लेकिन सिर्फ पिछले एक हफ्ते की घटनों पर ध्यान दें, तो आभास होता है कि इन प्रक्रियाओं में एक पक्ष का विश्वास नहीं रहा, जबकि संस्थाएं खुद निशाने पर आ गई हैं। भाजपा इस स्थिति को सिरे से नजरअंदाज कर रही है। यही आज का सबसे बड़ा संकट है।

Exit mobile version