चुनौतियों की वजह अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला भंग होने तथा अर्थव्यवस्था की कमजोरियों में छिपी हो, तो मौद्रिक नीति जैसे बैंड-एड नाकाफी साबित होते हैं, जबकि उनके साइड इफेक्ट्स से नई दिक्कतें सामने आती हैं।
फिलहाल ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति के मामले में अपना रुख “न्यूट्रल” से बदलकर “कैलिब्रेटेड टाइटनिंग” कर दिया है। इसका अर्थ है कि आगे ब्याज दर स्थिर रहेगी या बढ़ेगी, लेकिन यह घटेगी नहीं। फिलहाल संभावना यही है कि इस वित्त वर्ष में ब्याज दर और बढ़ेगी। पश्चिम एशिया के युद्ध से उपजे ऊर्जा एवं कमोडिटी संकट और धनी देशों में बॉन्ड ब्याज दर बढ़ने से दरपेश चुनौतियों के बीच रिजर्व बैंक के पास इसके अलावा शायद ही कोई और चारा है। भारत में अब ब्याज दर 5.5 प्रतिशत होने के बाद उम्मीद जताई गई है कि यहां से हो रहे पूंजी पलायन को रोकने में कुछ सहायता मिलेगी। ऐसा हुआ तो रुपये की गिरती कीमत को संभालना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
लेकिन बुधवार को ब्याज दर में वृद्धि के एलान के बावजूद रुपया पांच महीने के निचले स्तर तक गिर गया। स्पष्टतः नई मौद्रिक नीति भी रुपये को सहारा देने के लिहाज से पर्याप्त साबित नहीं हुई। जबकि नई नीति से महंगाई और बढ़ सकती है। खुद आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अगली तीन तिमाहियों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर के औसतन लगभग 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। अगस्त में ये दर पांच फीसदी थी। नई दर की घोषणा के बाद शेयर बाजार में ऑटो एवं उपभोक्ता सामग्री से जुड़ी कंपनियों और प्रॉपर्टी जैसे क्षेत्रों के शेयरों पर उलटा असर पड़ा।
दरअसल, ऊंची ब्याज दर के कारण कार, घर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महंगे सामानों के लिए ऋण लेना महंगा हो जाएगा। इससे अनेक ग्राहकों की खरीदारी क्षमता प्रभावित होगी। इस कदम का खराब असर कच्चे माल (जैसे तांबा, स्टील), परिवहन भाड़ा और ए.सी., टीवी, फ्रिज जैसी वस्तुओं के दाम पर भी पड़ सकता है। ये सामान 5-8 प्रतिशत तक और महंगे हो सकते हैं। तो कुल सूरत बिगड़ेगी। दरअसल, जब चुनौतियों की वजह अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला के भंग होने तथा अर्थव्यवस्था की मूलभूत कमजोरियों में छिपी हो, तो मौद्रिक नीति जैसे बैंड-एड नाकाफी साबित होते हैं, जबकि इनके साइड इफेक्ट्स से नई दिक्कतें सामने आ जाती हैं।
