विपक्षी दल “वोट चोरी” के सवाल पर पहल अपने हाथ में लेने से हिचक गए हैं। इसके बदले उन्होंने खुद को प्रतिरोध जताने और न्यायपालिका की पनाह में जाने के पारंपरिक तौर-तरीकों तक सीमित रखा है।
पहले कांग्रेस कार्य समिति और फिर इंडिया गठबंधन की बैठक में जो तय हुआ, उसका सार है कि विपक्षी दल “वोट चोरी” के सवाल पर पहल अपने हाथ में लेने से हिचक गए हैं। इसके बदले उन्होंने खुद को प्रतिरोध जताने और न्यायपालिका की पनाह में जाने के पारंपरिक तौर-तरीकों तक सीमित रखा है। इस सवाल पर उनमें कितनी उलझन या अनमनापन है, वह कांग्रेस कार्य समिति के मांग-पत्र से जाहिर हुआ। उसमें पहली मांग मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की रखी गई तथा चौथी एवं आखिरी मांग प्रधानमंत्री के इस्तीफे की! अगर किसी मुद्दे पर किसी पार्टी को प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगने की जरूरत महसूस होती है, तो स्पष्टतः यह उसकी सर्वोपरि मांग होगी। इसीलिए प्रमुख विपक्षी दल ने जिस रूप में अपनी मांगें रखीं, उससे रस्म-अदायगी का बोध ज्यादा हुआ। उधर इंडिया गठबंधन ने प्रतिरोध मार्च, निर्वाचन आयोग तक सांसदों का जुलूस, और एक नवंबर को दिल्ली में विशाल रैली के आयोजन के पहले चार अन्य रैलियां करने का एलान किया है। इसके अलावा चुनाव प्रक्रिया को स्वच्छ बनाने के लिए हस्तक्षेप करने की गुजारिश करते हुए उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका देने का भी निर्णय लिया है। लेकिन इनमें कोई ऐसा कदम नहीं है, जिसे विपक्ष ने पहले ना आजमाया हो।
यह उम्मीद रखने का शायद ही कोई आधार है कि इस बार उसके कार्यक्रमों को पहले से ज्यादा जन समर्थन मिलेगा। अधिक संभावना यही है कि उसका सारा विरोध औपचारिकता के दायरे में बंधा रह जाएगा। दरअसल, विपक्षी दल यह संदेश देने में भी नाकाम हैं कि “वोट चोरी” के मुद्दे वे सभी समान धरातल पर हैं। अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव ने ज्ञानेश कुमार को निशाना बनाने से असहमति जताई है। उनकी दलील है कि मोदी सरकार को सत्ता से हटा दिया जाए, तो सभी संस्थाएं स्वतः ठीक हो जाएंगी। लेकिन यह एक ठोस मुद्दे को अति तरल या हवाई बना देना है, जिससे किसी जन आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार नहीं होती। मोदी सरकार को हटाने की बात चुनावी गणित और समीकरणों के दायरे में चली जाती है, जिसका मौजूदा विवाद के सिलसिले में उल्लेख अतार्किक है।
