उन कदमों पर विचार अनिवार्य है, जिनसे दुस्साहसी कार्रवाइयों को चीन के लिए महंगा बनाया जाए। ऐसा तभी हो सकता है, जब भारत के पास राष्ट्रीय सहमति से तैयार समग्र चीन नीति हो।
भारत- चीन संबंध में फिर पेच पड़े हैं। विदेश मंत्रालय ने यह स्पष्ट कर उचित कदम उठाया है कि द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए सीमा पर शांति का “सर्वोच्च” महत्त्व है। बेशक, उस हाल में संबंध आगे बढ़ते नहीं रह सकते, जब सीमा पर अतिक्रमण या घुसपैठ की खबरें लगातार आ रही हों। हाल में कुछ ऐसे रील्स वायरल हुए, जिनमें अरुणाचल प्रदेश के स्थानीय लोग सीमा की रक्षा को लेकर भारत की कथित उदासीनता की चर्चा करते सुने गए। कुछ खबरों में दावा किया गया कि चीनी सेना के जवानों ने अरुणाचल के ऊपरी सुबनसिरी ज़िले के ताकसिंग सर्कल में पुकार ला और ओल्लो के पास वास्तविक नियंत्रण रेखा पार की। इसी पृष्ठभूमि में विदेश मंत्रालय ने कहा है कि सीमा क्षेत्रों की स्थिति भारत- चीन संबंधों पर असर डालेगी। उसने दोहराया कि चीनी सैनिकों की घुसपैठ को भारत सबसे गंभीर मुद्दा मानता है, जिसे चीन से बातचीत में हमेशा उठाया गया है।
बहरहाल, सवाल है कि चीन भारत की इस चिंता का कितना ख्याल रख रहा है? भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ से वह बाज क्यों नहीं आता? ऐसे प्रश्नों का उत्तर सरकारी सूत्रों के सिर्फ ऐसे बयानों से नहीं मिल सकता कि भारतीय सेना और भारत- तिब्बत सीमा पुलिस सतर्क हैं और चीनी गतिविधियों पर नज़र रख रही हैं। इसलिए कि चीन अगर यह मान कर चलता है कि उसे नुकसान पहुंचाने लायक विकल्प भारत के पास नहीं हैं, तो वह अपनी गतिविधियों को आगे बढ़ाता रहेगा। वहां के नीतिकारों की नजर निश्चित रूप से इस घटनाक्रम पर होगी कि सीमा पर की घटनाओं के बावजूद चीन से आयात बढ़ाने, और अब चीनी पूंजी को आमंत्रित करने की दिशा में भारत आगे बढ़ता गया है। साथ ही ऐसी खबरें भी नहीं आई हैं, जिनसे पता चले कि सीमा पर चीनी फौज को दो-टूक जवाब दिया गया हो। अतः उन कदमों पर विचार अनिवार्य है, जिनसे दुस्साहसी कार्रवाइयों को चीन के लिए महंगा बनाया जाए। ऐसा तभी हो सकता है, जब भारत के पास राष्ट्रीय सहमति से तैयार समग्र चीन नीति हो। अब इस दिशा में पहल की जरूरत है।
