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चीन के सहारे नहीं

बिना अपनी जमीन तैयार किए चीन की आपूर्ति शृंखला से जुड़कर विकसित होने की सोच समस्याग्रस्त है। विकास के लिए भारत को आखिरकार अपना मॉडल और अपनी सीढ़ी तैयार करनी ही होगी।

फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष अनंत गोयनका की ये राय अहम है कि भारत को चीन से बचने की कोशिश के बजाय उससे कारोबारी संबंध बढ़ाने चाहिए। मैनुफैक्चरिंग क्षमता की मजबूती, नवाचार को बढ़ावा और वैश्विक आपूर्ति शृंखला से अधिक गहराई से जुड़ने के लिए ऐसा करना जरूरी है। फिक्की के सदस्य सीईओज के एक दल की पांच दिवसीय चीन यात्रा के बाद गोयनका चीन ये तीन खास बातें कहीः पहली, चीन कड़े मुकाबले वाले एक फाइटिंग रिंग की तरह है। वहां कंपनियां ऐसे 2-3 प्रतिशत की मार्जिन (मुनाफे) पर काम करती हैं। इस प्रतिस्पर्धा में सिर्फ कठोर और सर्वश्रेष्ठ कंपनियां ही टिक पाती हैं। दूसरी, वहां अनुसंधान एवं विकास और ऑटोमेशन उच्चतम स्तर पर हैं। कंपनियां इन क्षेत्रों में निवेश दास साल के भविष्य को ध्यान में रखकर करती हैं, ना कि किसी तिमाही नतीजे को देख कर।

और तीसरी बात यह कि वहां सरकार एक मूक शेयरधारक है। सस्ता कर्ज, जमीन, बिजली और नीतिगत सहयोग इस पैमाने पर मिलता है कि प्रति इकाई लागत और मुनाफे का गणित बदल जाता है। इस कारण दूसरे देशों की कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा का धरातल समान नहीं रह जाता। गोयनका की टिप्पणियां भारतीय कारोबारी सोच में बड़े बदलाव का संकेत हैं। भारतीय उद्योगपति अब इस भय से निकल गए हैं कि चीन भारत पर हावी हो सकता है। बल्कि राय यह उभरी है कि औद्योगिक विकास के अगले दौर में जाने के लिए चीनी आपूर्ति शृंखला से जुड़ना आवश्यक हो गया है।

लेकिन गोयनका का यह तर्क विवादास्पद है कि भारत को औद्योगिक विकास के पारंपरिक चरणों को छोड़ देना कर सीधे डिजिटल रूप से एकीकृत, कम इंसानी दखल वाले उत्पादन की ओर बढ़ना चाहिए। उल्लेखनीय है कि हर विकसित देश ने ऑटोमेशन तब अपनाया, जब वह बड़े पैमाने पर उत्पादन को व्यवस्थित करना सीख चुका था। नीचे की सीढ़ियां छोड़कर भारत सीधे चोटी पर नहीं पहुंच सकता। यानी बिना अपनी जमीन तैयार किए चीन से जुड़कर विकसित होने की सोच समस्याग्रस्त है। विकास के लिए भारत को आखिरकार अपना मॉडल और अपनी सीढ़ी तैयार करने ही होगी।

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