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इतनी निर्भरता ठीक नहीं

मैन्युफैक्चरिंग

चीन पर भारत की प्रमुख निर्भरता उपभोक्ता वस्तुओं के मामले में नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादन के क्षेत्र में है। इसका मतलब है कि भारत का कारखाना क्षेत्र चीन से आए पाट-पुर्जों और रासायनिक सामग्रियों पर अत्यधिक निर्भर हो चुका है।

चीन पर भारत की कारोबारी निर्भरता चिंताजनक स्तर तक पहुंच गई है। सवाल सिर्फ बढ़ते व्यापार घाटे का नहीं है, जो पिछले वित्त वर्ष में 112.16 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। उससे बड़ा मुद्दा भारतीय मैनुफैक्चरिंग की चीनी आपूर्ति शृंखला पर बढ़ी निर्भरता है। थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने अपने ताजा विश्लेषण में इस ओर ध्यान खींचा है कि 2025-26 में चीन से भारत का कुल आयात 131.63 बिलियन डॉलर का रहा, जिसमें 98.5 प्रतिशत हिस्सा औद्योगिक उत्पादों का था। भारत के कुल आयात में चीन का हिस्सा 16 फीसदी तक पहुंच गया है, लेकिन सिर्फ औद्योगिक उत्पादों पर ध्यान दें, तो उसमें चीनी आयात का हिस्सा 30.8 फीसदी है।

इसके भीतर भी इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कंप्यूटर और ऑर्गेनिक केमिकल्स पर गौर करें, तो भारत के कुल आयात में चीन का हिस्सा 66 प्रतिशत है। इन आंकड़ों से जाहिर है कि चीन पर भारत की प्रमुख निर्भरता उपभोक्ता वस्तुओं के मामले में नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादन के क्षेत्र में है। साधारण भाषा में इसका मतलब है कि भारत का कारखाना क्षेत्र चीन से आए पाट-पुर्जों और रासायनिक सामग्रियों पर अत्यधिक निर्भर हो चुका है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक पाट-पुर्जे, विद्युत वाहनों की बैटरियां, सोलर मॉड्यूल, औषधियों में इस्तेमाल होने वाले एपीआई, और खास रसायन शामिल हैं। किसी एक सप्लायर पर इतनी निर्भरता स्वस्थ स्थिति नहीं मानी जा सकती।

खास कर उस आपूर्तिकर्ता पर तो बिल्कुल नहीं, जिसके साथ संबंधों की पृष्ठभूमि में तनाव पलता- पनपता रहता है। भू-राजनीतिक या व्यापारिक प्रतिस्पर्धा संबंधी कारणों से यह तनाव कभी भी अनियंत्रित हो सकता है। फिलहाल सूरत यह है कि चीन भारत के घरेलू उद्योग को अस्त-व्यस्त करने की हैसियत में है। अतः भारत के नीति-निर्माताओं को जीटीआरआई के इस सुझाव को गंभीरता से लेना चाहिए कि देश के अंदर क्षमता विकसित करना और आपूर्ति शृंखला को एक के बजाय अनेक स्रोतों से जोड़ना इस वक्त भारत के सामने मौजूद प्रमुख चुनौती है। जीटीआरआई के मुताबिक किसी भी महत्त्वपूर्ण क्षेत्र में किसी एक देश पर आयात निर्भरता 30 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। यह तार्किक सुझाव है, जिसे नजरअंदाज करना जोखिम मोल लेना होगा।

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