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अमेरिका की चाहत

दो बातें साफ हैं। ट्रंप प्रशासन को आंख में आंख डाल करबात करना और संप्रभुता का उल्लेख करना नागवार गुजरा है। कोई देश उससे बातचीत में अपने आर्थिक हितों की बात करे, यह उनके प्रशासन को मंजूर नहीं है।

डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन क्यों भारत से खफा हुआ, इसके राज़ खुद उनके अधिकारी खोल रहे हैं। वाणिज्य मंत्री स्कॉट बेसेंट कह चुके हैं कि कारण सिर्फ रूस का कच्चा तेल खरीदना नहीं है, बल्कि व्यापार वार्ता में भी भारत ‘अड़ियल’ रुख अपना रहा था। अब राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के प्रमुख व्यापार सलाहकार पीटर नोवेरो कहा है कि ‘वे (भारतीय) इतने घमंडी हैं कि हमारी आंख में आंख डाल कर कहते हैं कि उनके यहां आयात शुल्क ऊंचा नहीं है। रूसी तेल के बारे में वे कहते हैं यह हमारी संप्रभुता है, हम जहां से चाहें तेल खरीद सकते हैँ।’

तो दो बातें साफ हैं। ट्रंप प्रशासन को ‘आंख में आंख डाल कर’ बात करना और संप्रभुता का उल्लेख करना नागवार गुजरा है। जब ट्रंप टैरिफ एवं अन्य माध्यमों से अमेरिकी ‘महानता’ को वापस लाने की खामख्याली पाले हुए हैं, उस समय एक देश, जिसने खुद अपनी अमेरिका का पिछलग्गू होने की छवि बनाई, वह अपने हितों की बात करे, यह उनके प्रशासन को मंजूर नहीं हुआ। ऐसे में यह साफ है कि भारत अमेरिकी कंपनियों के लिए अपने बाजार और संसाधनों को पूर्णतः खोल कर और अपने नुकसान की कीमत पर अमेरिकी रणनीतिक योजना का हिस्सा बन कर ही अमेरिकी टैरिफ की मार से बच सकता था।

अब विचारणीय है कि क्या भारत को इतनी ऊंची कीमत चुकानी चाहिए? भारत में अमेरिका समर्थक जनमत बहुत मजबूत है। भारतीय प्रभु वर्ग के अमेरिका एवं उसके नेतृत्व वाले नव-उदारवादी आर्थिक मॉडल से गहरे निहित स्वार्थ जुड़े हुए हैँ। ऐसे में यह दलील देने वाले लोगों की कमी नहीं है कि भारत सरकार को अपना रुख बदल कर अमेरिका से रिश्तों को संभाल लेना चाहिए। मगर ऐसे समूहों को याद रखना चाहिए कि वर्तमान केंद्र सरकार का स्वाभाविक झुकाव भी उनकी तरह अमेरिका के पक्ष में रहा है। इसके बावजूद उसका रुख अमेरिका को बुरा लगा है, तो उसका सिर्फ एक मतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने एक सीमा पर जा कर ब्रेक लगाया। इससे आगे और झुकने की मांग सिर्फ नासमझी या अति स्वार्थी नजरिया अपना कर ही की जा सकती है।

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