भारतीय सोलर सेल और पैनलों पर 123.04 प्रतिशत की एंटी-डंपिंग और 126.09 प्रतिशत काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगाने का प्रस्ताव अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग को भेजा गया है, जो इस पर 14 अक्टूबर को फैसला करेगा।
भारतीय कारोबार पर अमेरिका फिर बड़ा प्रहार करने जा रहा है। वहां के वाणिज्य विभाग ने भारत, इंडोनेशिया, और लाओस से सोलर सेल और सोलर पैनल के आयात पर भारी शुल्क लगाने की योजना को अंतिम रूप दे दिया है। उसका आरोप है कि “अनुचित सरकारी सब्सिडी” का लाभ उठा कर इन देशों की कंपनियों ने सस्ते उत्पाद बनाए, जिन्हें अमेरिकी बाजार में थोक भाव में उतारा गया। इन तीनों देशों में सबसे ज्यादा शुल्क भारत से होने वाले आयात पर लगाने का इरादा जताया गया है। भारतीय सोलर सेल और पैनलों पर 123.04 प्रतिशत की एंटी-डंपिंग ड्यूटी और 126.09 प्रतिशत प्रतिपूरक (काउंटरवेलिंग) शुल्क लगाने का प्रस्ताव अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग को भेजा गया है, जो इस पर 14 अक्टूबर को फैसला करेगा।
उसने प्रस्ताव स्वीकार कर लिए, तो भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में अपने उत्पाद बेचना बेहद मुश्किल हो जाएगा। इसकी बहुत गहरी मार भारतीय सौर उद्योग पर पड़ेगी। फिलहाल, भारत के सौर मॉड्यूल निर्यात का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका जाता है। जब से अमेरिका ने चीनी उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए, उससे खाली हुई जगह को भारत और कुछ दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने भरा। यानी अमेरिकी सौर उद्योग को उसका लाभ नहीं मिला। इसीलिए अमेरिकी सौर कारोबारियों के संगठन इसके खिलाफ लॉबिंग में जुटे रहे हैं। उन्होंने यह प्रचार कर अपने पक्ष में माहौल बनाया कि चीनी पाट-पुर्जों का भारत और अन्य देशों में असेंबल होकर अमेरिका पहुंचना जारी है।
अब उन्हें सफलता मिलती दिख रही है। यह भारत के लिए नई चुनौती है। भारत को इस पर दृढ़ रुख अपनाना चाहिए। एक तरफ भारत तो डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के दबाव में अमेरिकी उत्पादों की खरीदारी बढ़ा रहा है, वहीं भारतीय उत्पादों की अमेरिकी बाजार में पहुंच कठिन होती जा रही है। अतः नरेंद्र मोदी सरकार को यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि ऐसी गैर-व्यापार रुकावटें भारत को मंजूर नहीं है। ऐसी रुकावटों के रहते अमेरिका से प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। सिर्फ ऐसे सख्त रुख से ही भारत अपने सौर एवं अन्य उद्योगों के हित की रक्षा कर सकता है।
