गैर-व्यापार रुकावटों का इस्तेमाल अमेरिका सहयोगी देशों के खिलाफ कर रहा है। इसका विरोध हर संप्रभु सरकार का कर्त्तव्य है। हैरतअंगेज है, मोदी सरकार ऐसे कर्त्तव्य निभाने की चर्चा भर से विचलित हो जाती है!
वैसे देखा जाए, तो भारत सरकार की छवि के लिहाज से समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने सकारात्मक खबर दी। बताया कि हाल में अमेरिका से व्यापार वार्ता के दौरान नरेंद्र मोदी सरकार ने आत्म-विश्वास का परिचय देते हुए जल्दबाजी में करार करने से इनकार कर दिया। इस “आत्म-विश्वास” की वजह नए व्यापार साथी ढूंढने में मिली सफलता, देश में आर्थिक जोखिमों का घटना, और (हाल में) हासिल हुई सियासी कामयाबियों को बताया गया। मगर इस खबर से भारत सरकार विचलित हो गई। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसे ‘पूरी तरह गलत, निराधार, और गुमराह’ करने वाली खबर बताया।
सोशल मीडिया पर उन्होंने कहा कि जून में दिल्ली में हुई बातचीत के दौरान दोनों पक्ष ऐसा समझौता करने के प्रति वचनबद्ध रहे, जो ‘संतुलित, व्यापारिक रूप से सार्थक, और दोनों देशों के कारोबारियों, किसानों, श्रमिकों और उपभोक्ताओं के लिए ठोस रूप से लाभदायक’ हो। उसके बाद वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने प्रेस कांफ्रेंस कर एलान किया कि दोनों देशों के बीच फ्रेमवर्क डील तैयार है, जिस पर “सही समय पर” दस्तखत होंगे। फिलहाल भारत का ध्यान अमेरिका से ऐसा डील हासिल करने पर है, जिससे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में वहां भारतीय उत्पादों पर कम टैरिफ लगे। मगर इस बारे में स्थिति साफ नहीं की गई है कि अमेरिका विभिन्न देशों के साथ-साथ भारत के खिलाफ भी अत्यधिक उत्पादन क्षमता और जबरिया मजदूरी के इस्तेमाल की जो जांच कर रहा है, उसके तहत टैरिफ लगा, तो उस पर भारत का क्या रुख होगा?
जबरिया मजदूरी के इस्तेमाल के आरोप में उसने भारत सहित 54 देशों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा हुआ है। इसी तरह ‘अनुचित व्यापार व्यवहार’ के जरिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के इल्जाम में वहां अन्य देशों के साथ भारत के खिलाफ भी जांच चल रही है। ये सब गैर-व्यापार रुकावटें हैं, जिनका इस्तेमाल डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन सहयोगी देशों के खिलाफ कर रहा है। ऐसे उपायों का आत्म-विश्वास के साथ विरोध करना हर संप्रभु देश की सरकार का कर्त्तव्य है। लेकिन मोदी सरकार ऐसे कर्त्तव्य निभाने की “निराधार” खबर से भी विचलित हो जाती है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
