अमेरिका अपनी ताकत का इस्तेमाल विकासशील देशों की पूंजी और औद्योगिक विशेषज्ञता को झटकने के लिए कर रहा है। भारत ने इस रुझान का मुकाबला करने की इच्छा तक नहीं दिखाई है।
एस्सार ग्रुप लगभग 15 बिलियन डॉलर के निवेश से अमेरिका में अपनी स्टील कारखाना परियोजना को पुनर्जीवित करेगा। एस्सार ग्रुप के मालिक रुइया बंधुओं ने अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके मंत्रियों की मौजूदगी में यह हाई प्रोफाइल एलान किया। इस तरह ये समूह उन भारतीय कंपनियों में शामिल हो गया है, जिन्होंने इस वर्ष अमेरिका में अरबों डॉलर के निवेश की घोषणा की है। सन फार्मस्यूटिकल्क, जेएसडब्लू स्टील, अभ्युदय ग्रुप, स्टरलाइट टेक्नोलॉजीज, और पीआर जिंदल समूह पहले ही डॉनल्ड ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ मुहिम का हिस्सा बन चुके हैं।
कहा जा सकता है कि जब ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ की दीवार से विदेशी उत्पादों का अमेरिका आना मुश्किल कर दिया है, वहां अपना बाजार बचाने का इन कंपनियों के पास यही रास्ता बचा है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि सारी दुनिया की कीमत पर अपने देश को फिर ‘औद्योगिक शक्ति’ बनाने की ट्रंप की योजना से भारत जैसे पूंजी के अभाव से ग्रस्त देश के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हुई है। भूमंडलीकरण के दौर में भारत जैसे देशों की कोशिश पश्चिमी पूंजी और तकनीक को आकर्षित करने की रही। इसके लिए उन्होंने अपने नियम-कायदे बदले। लेकिन ट्रंप काल में दुनिया का सबसे विकसित देश अपनी ताकत का इस्तेमाल विकास की सीढ़ी पर पिछड़े देशों की पूंजी और औद्योगिक विशेषज्ञता को झटकने के लिए कर रहा है।
इसे भारत की विवशता की कहा जाएगा कि उसने इस रुझान का मुकाबला करने की इच्छा तक नहीं दिखाई है। नतीजतन, भारतीय बाजार से मिले अवसर से यहां की कंपनियों ने जो धन कमाया, उसका निवेश वे ‘अमेरिका को महान बनाने’ में कर रही हैं। इस क्रम में एस्सार ग्रुप का मामला और भी विवादास्पद है। भारतीय बैंकों के डिफॉल्टरों में यह समूह दसवें नंबर पर रही है। तीन भारतीय बैंकों ने उससे कर्ज वसूली की प्रक्रिया चला रखी है। टेलीकॉम, बिजली, स्टील, इन्फ्रास्ट्रक्चर, तेल आदि क्षेत्रों में निवेश के लिए एस्सार ने जो कर्ज लिए, उसका एक बड़ा हिस्सा उसने नहीं चुकाया। और अब वह विशाल निवेश अमेरिका में करने जा रही है। इस पर भारतवासियों का खुद को असहज महसूस करना लाजिमी ही है।
