विपक्ष को कॉकरोच आंदोलन में ‘राजनीतिक पूंजी’ नजर आई हो, तो यह स्वाभाविक ही है। वैसे, अभी वक्त इस पूंजी को सहेजने का है, लेकिन इन पार्टियों में अभी से इसकी छीना-झपटी के संकेत मिलने लगे हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन देशवासियों के बड़े हिस्से का ध्यान खींचने में सफल रहा है। सोमवार को उसके संसद मार्च के दौरान बड़े पैमाने पर छात्रों पर दमन ने उसके एंजेडे के लिए समर्थन में और इजाफा किया है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर जोर डालने के लिए जगह-जगह हुए स्वतःस्फूर्त प्रतिरोध से साफ है कि जनमत का बहुत बड़ा हिस्सा इस मुद्दे पर केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ हो गया है। ऐसे में विपक्षी दलों को इस आंदोलन में ‘राजनीतिक पूंजी’ नजर आई हो, तो यह स्वाभाविक ही है। वैसे, अभी वक्त इस पूंजी को सहेजने तथा उसे और बढ़ाने का है, लेकिन विपक्षी पार्टियों में अभी से इसकी छीना-झपटी शुरू होने के संकेत मिलने लगे हैं।
मंगलवार को उनमें कॉकरोच आंदोलन के प्रति समर्थन जताने की होड़ लग गई। इस दौरान कुछ पार्टियों ने हिरासत से छात्रों को रिहा कराने और जख्मी छात्रों के इलाज में मदद करने की सराहनीय पहल की। लेकिन शाम होते-होते इस पूंजी को ज्यादा से ज्यादा हथियाने की होड़ के संकेत भी मिलने लगे। शुरुआत में कांग्रेस ने “कॉकरोचों” से दूरी बनाए रखी और उसके सोशल मीडिया समर्थक इस आंदोलन के पीछे किसी साजिश का संकेत देखते रहे। इस दौरान कॉकरोचों को आम आदमी पार्टी का मोर्चा या “राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता”से ध्यान भटकाने की भाजपा की साजिश साबित करने की पुरजोर कोशिश उन हलकों में हुई।
लेकिन मंगलवार को जब देश भर से कॉकरोचों के लिए समर्थन उमड़ने लगा, तो कांग्रेस ने प्रधानमंत्री निवास के बाहर हाई प्रोफाइल धरना आयोजित कर दिया। मेनस्ट्रीम मीडिया में इसको मिली अहमियत से आम आदमी पार्टी को जलन महसूस हुई, तो उसके नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी और राहुल गांधी के बीच मिलीभगत के आरोप सार्वजनिक रूप से लगा दिए। उधर महीने भर तक मुंह फेरे रहे कई दलों के नेता मंगलवार को हाजिरी लगाने जंतर-मंतर पहुंचे। जबकि होना यह चाहिए था कि ये तमाम दल आत्म-निरीक्षण करते कि जिस तरह जन मानस को कॉकरोचों ने आकर्षित कर लिया है, गुजरे 12 साल में वैसा करने में ये दल क्यों नाकाम रहे हैं?
