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जंतर-मंतर ही सही

सर्वोच्च न्यायालय पहले यह कह चुका है कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रतिरोध पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि विरोध प्रदर्शन संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। अब इस पैमाने को नहीं बदला जाना चाहिए।

यह निराशाजनक है कि सर्वोच्च न्यायालय ने जंतर-मंतर से हटा कर प्राथमिक प्रतिरोध स्थल को रामलीला मैदान तय करने की याचिका को गंभीरता से लिया। नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के आयोजन पर पहले ही कई बंदिशें लग चुकी हैं। ऐसे में आशंका है कि सुप्रीम कोर्ट के ऐसी याचिका को अहमियत देने को सरकार एक अवसर के रूप में ले सकती है। इस हफ्ते एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें मांग की गई है कि राष्ट्रीय राजधानी में रामलीला मैदान को प्राथमिक प्रदर्शन स्थल बनाया जाए। कोर्ट ने इसे “महत्वपूर्ण मामला” मानते हुए सॉलीसिटर जनरल को केंद्र से इस पर सलाह लेने का निर्देश दिया।

यहां यह याद करना उचित होगा कि तीन दशक पहले विरोध प्रदर्शन का प्राथमिक स्थल बोट क्लब था, जो संसद भवन और राष्ट्रपति भवन के ठीक सामने है। विरोध के स्वर के प्रति असहनशीलता दिखाते हुए तत्कालीन सत्ताधारियों ने प्राथमिक प्रदर्शन स्थल को जंतर-मंतर तय कर दिया। दिल्ली पुलिस के मौजूदा नियमों के अनुसार किसी प्रदर्शन में 1,000 से कम लोग शामिल होने हों, तो जंतर-मंतर पर आयोजन की अनुमति दी जाती है। 1,000 से अधिक संभावित उपस्थिति के लिए रामलीला मैदान तय किया गया है। अभी हाल में जंतर-मंतर पर हुए ‘कॉकरोच’ प्रदर्शन से सरकार के लिए कठिन स्थितियां पैदा हुईं। जंतर-मंतर से भी दूरी कम है, इसलिए वहां से संसद मार्च आयोजित करना आसान रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका को इसी पृष्ठभूमि देखा जाना चाहिए। इस सिलसिले में खुद सर्वोच्च न्यायालय के 2018 में दिए एक निर्णय को याद करना उचित होगा, जब कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान शिफ्ट करने के एक आदेश को खारिज कर दिया था। अदालत ने कहा था कि जंतर-मंतर या बॉट क्लब जैसी जगहों पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि विरोध प्रदर्शन संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। अब इस पैमाने को नहीं बदला जाना चाहिए। लोगों की आवाज संसद और सरकार तक पहुंच सके, इसके लिए निकटतम जगह पर प्रदर्शन के जन अधिकार की रक्षा अति अवश्यक है।

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