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कठघरे में खड़ा कॉलेजियम

New Delhi, May 22 (ANI): A view of the Supreme Court of India, in New Delhi on Thursday. (ANI Photo/Rahul Singh)

कॉलेजियम सिस्टम के पक्ष में यही दलील दी जाती है कि जजों की नियुक्ति एवं तबादले सरकार के हाथ में चले गए, तो न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप होने लगेगा। मगर क्या कॉलेजियम ऐसे दखल से जजों को बचा पा रहा है?

सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल तो पुराने हैं, लेकिन अब इन्हें सर्वोच्च न्यायपालिका के अंदर से उठाया जा रहा है, तो स्पष्टतः इसे अधिक गंभीरता से लिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों- दीपांकर दत्त और मनमोहन ने इस व्यवस्था के संचालन को लेकर गंभीर टिप्पणियां की हैं। दोनों की शिकायतें अलग-अलग हैं, लेकिन उससे कॉलेजियम को लेकर बढ़ रहे असंतोष की झलक मिलती है। जस्टिस दत्त ने कहा कि जिन जजों ने साहस एवं नैतिक दृढ़ता का परिचय दिया, कॉलेजियम उन्हें संरक्षण देने में नाकाम रहा। उन्होंने चेताया कि ऐसी घटनाओं से सिद्धांतों को तरहीज देने वाले जज हतोत्साहित हो सकते हैं।

न्यायमूर्ति मनमोहन ने कॉलेजियम के प्रति हाई कोर्ट के जजों में बढ़े अविश्वास की चर्चा की। कहा कि न्यायिक नियुक्तियों के मामले में हाई कोर्ट से आई सिफारिशों को अहमियत ना दिए जाने की शिकायत गहरा गई है, इसलिए कॉलेजियम को इस पर आत्म-निरीक्षण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम और केंद्र सरकार हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के प्रति संदेह का रुख रखते हैं। तो मुद्दा यह है कि कॉलेजियम अगर कर्त्तव्यनिष्ठ जजों को संरक्षण नहीं दे सकता, तो फिर उसके होने का औचित्य क्या है? ये प्रणाली खुद सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से स्थापित की और इसमें बदलाव की कोशिशों को वह नाकाम करता रहा है।

इसके पक्ष में यही दलील दी जाती है कि जजों की नियुक्तियां/ तबादले सरकार के हाथ में चले गए, न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बन जाएगी। मगर अब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी संकेत दे रहे हैं कि प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाला कॉलेजियम सियासी दखल से जजों को संरक्षण नहीं दे पा रहा है। कॉलेजियम के पीछे मुख्य धारणा यही है कि इसका मकसद ये सुनिश्चित करना है कि न्यायपालिका पूर्ण स्वतंत्रता से काम कर सके। मगर, ऐसा तभी संभव है, जब संस्था की अंदरूनी कार्य-प्रणाली आम-सहमति और व्यापक भागीदारी से प्रेरित हो। उच्चतम न्यायालय के पांच जज बाकी सबकी सिफारिशों की अनदेखी करने लगें, तो फिर इस व्यवस्था के लोकतांत्रिक स्वरूप पर प्रश्न खड़े होंगे। दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज ऐसा ही हो रहा है।

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