कहना कठिन है कि किसानों का संघर्ष कितना प्रभावी होगा। लेकिन यह साफ है कि किसान- मजदूर वर्गों में वर्तमान आर्थिक नीतियों के खिलाफ लामबंद होने की जरूरत का अहसास लगातार गहरा रहा है।
किसान संगठन फिर आंदोलन की राह पर हैं। गुजरे दस अगस्त को उन्होंने ‘जेल भरो’ मुहिम चलाई। अब वे सांसद और विधायकों सहित सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपना मांग-पत्र सौंप रहे हैं। उनकी मांगों और घोषित रणनीति पर गौर करें, तो संकेत मिलता है कि अकेले लड़ाई लड़ने की अपर्याप्तता का उन्हें अहसास हुआ है। इसलिए उन्होंने अपने संघर्ष में खेतिहर और शहरी मजदूरों को शामिल करने के साथ-साथ अपने मांग-पत्र में संघीय व्यवस्था तथा अर्थव्यवस्था की आम दिशा से जुड़े मुद्दों को भी शामिल किया है। उनका आरोप है कि केंद्र ‘कॉरपोरेट केंद्रित’ नीतियों को आगे बढ़ा रहा, जिसकी मार किसान, मजदूर एवं आम मध्यम वर्ग पर पड़ी है।
इसलिए अपने को कृषि क्षेत्र तक सीमित रखने के बजाय संयुक्त किसान मोर्चा ने अपने मांग-पत्र को आजीविका, रोजगार एवं सामाजिक सुरक्षा के बड़े दायरे से जोड़ा है। उनकी एक प्रमुख मांग है कि कर राजस्व का राज्यों को दिए जाने वाले हिस्से की मात्रा 31 से बढ़ा कर 50 फीसदी की जाए। मोर्चा का तर्क है कि कृषि संकट हल करने, कृषि आधारित औद्योगीकरण और जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए राज्यों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता मिलना अनिवार्य है। मांग पत्र में भारत- अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते के लिए जारी वार्ता पर विरोध जताया गया है। साथ ही हाल में हुए तमाम मुक्त व्यापार समझौतों को रद्द करने की मांग की गई है।
किसान संगठनों का दावा है कि ये सारे समझौते कृषक हितों के खिलाफ हैं। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक न्यूनतम समर्थन मूल्य, व्यापक कृषि कर्ज माफी, 200 दिन काम की गारंटी और 700 रुपये प्रति दिन मजदूरी के प्रावधान के साथ मनरेगा की बहाली, चार श्रम संहिताओं को रद्द करने, भूमि अधिकारों के संरक्षण, और बिजली निजीकरण एवं बीज विधेयकों की वापसी की मांग भी दोहराई गई है। फिलहाल, कहना कठिन है कि इस बार अधिक बड़ा मोर्चा बनाकर किसानों ने संघर्ष का जो एलान किया है, वह असल में कितना प्रभावी होगा। लेकिन यह जरूर है कि किसान- मजदूर वर्गों में आर्थिक नीतियों की वर्तमान दिशा के खिलाफ लामबंद होने की जरूरत का अहसास लगातार गहराता जा रहा है।
