सरकार ने उलझे हालात का हल निकालने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की है। उसने समस्या को महज कानून-व्यवस्था के नजरिए से देखा है। मगर उस मोर्चे पर भी कामयाबी नहीं मिली है, जिसकी मिसाल ताजा घटनाएं हैँ।
मणिपुर में हालात लगातार इतने सुलगे हुए हैं कि कोई भी चिंगारी पड़ते ही लपटें उठने लगती हैं। बिशुनपुर जिले में मंगलवार को बम फेंके जाने की घटना के बाद यही हुआ। बम एक आम परिवार के घर पर फेंका गया, जिसमें दो बच्चों की मौत हो गई। उसके बाद भड़की भीड़ ने जगह- जगह सुरक्षा ठिकानों सहित अन्य स्थलों को निशाना बनाया। उन पर हुई पुलिस कार्रवाई में दो और लोग मारे गए। पांच जिलों में कर्फ्यू लगाते हुए इंटरनेट बंद करना पड़ा। बम संभवतः कुकी उग्रवादियों ने फेंका, जिसका शिकार मैतेई परिवार बना।
बाद में विरोध प्रदर्शनों के दौरान मारे गए दोनों व्यक्ति मैतेई समुदाय के ही हैं। इन घटनाओं ने फिर जाहिर किया है कि मणिपुर में हालात लगातार असामान्य बने हुए हैं। बल्कि मई 2023 में हिंसा शुरू होने के बाद से वहां मैतेई और कुकी समुदायों के बीच खाई लगातार चौड़ी होती गई है। इससे पूरे राज्य में अविश्वास का माहौल है। केंद्र और राज्य सरकारों ने उलझते गए हालात का हल निकालने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की है। उन्होंने समस्या को महज कानून- व्यवस्था के नजरिए से देखा है। मगर उस मोर्चे पर भी प्रशासन कामयाब नहीं हुआ है, जिसकी मिसाल ताजा घटनाएं हैँ। वैसे जहां अशांति की जड़ में दो समुदायों के बीच जारी तनाव हो, वहां कानून- व्यवस्था संबंधी उपायों से सामान्य स्थिति बहाल नहीं की जा सकती।
इस मोर्चे पर सत्ताधारी दल या किसी अन्य राजनीतिक पक्ष ने जमीनी पहल नहीं की है। आवश्यकता दोनों में समुदायों के बीच संवाद बनाने और सद्भाव पैदा करने की है, ताकि उनमें एक- दूसरे के प्रति गहराते गए वैर भाव को दूर करने का रास्ता निकले। फिलहाल सूरत यह है कि कुकी संगठन अलग प्रदेश की मांग पर अड़े हुए हैँ। उन्हें नहीं लगता मैतेई बहुल मणिपुर में वे सुरक्षित रह पाएंगे। केंद्र ने मणिपुर में मुख्यमंत्री बदल कर नई सरकार में कुकी विधायकों को नुमाइंदगी देते हुए मसले का हल निकालने की कोशिश की। लेकिन उससे बात नहीं बनी है। अतः अब ऐसी जमीनी पहल की जरूरत है, जिसमें दोनों पक्षों का भरोसा और भागीदारी हो।
