मणिपुर में जारी सामाजिक अस्थिरता के कारण लंबे समय से मौजूद रहीं अलगाववादी ताकतों को फिर सिर उठाने का मौका मिला है। मैतेई समुदाय से संबंधित इन संगठनों को अंगभीरता से कतई नहीं लिया जाना चाहिए।
किसी क्षेत्र लंबे समय तक सामाजिक को चलते रहने देने का यही नतीजा होता है कि देश विरोधी तत्व उसका फायदा उठाते हैं। सवा तीन साल से मणिपुर में जारी हिंसा के सिलसिले में ऐसी आशंका को लेकर केंद्र को लगातार आगाह किया गया है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि केंद्र या तो समाधान ढूंढने में अयोग्य साबित हुआ, अथवा सत्ता पक्ष ने अपनी किन्हीं सियासी गणनाओं के तहत वहां विस्फोटक स्थिति बने रहने दी है। इससे मणिपुर में लंबे समय से मौजूद रहीं अलगाववादी ताकतों को फिर सिर उठाने का मौका मिला है। सात प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों 15 अक्टूबर को 12 घंटे के ‘बंद’ का आह्वान किया है।
ये सभी संगठन मुख्य रूप से इंफाल घाटी के मैतेई समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। 15 अक्टूबर को घोषित कथित “नेशनल ब्लैक डे” का मकसद 1949 में मणिपुर के भारत में हुए विलय का विरोध करना है। ये संगठन मणिपुर को उसके पुराने नाम ‘कांग्लेइपाक’ से संबोधित करते हैं। उनका दावा है कि मणिपुर का भारत में हुआ विलय “कानूनी प्रावधानों के खिलाफ” था। इन प्रतिबंधित संगठनों ने ये कदम उस समय उठाया है, जब मणिपुर में नए सिरे से हिंसा का माहौल बना हुआ है। इस महीने के दूसरे सप्ताह में राज्य के पहाड़ी जिलों, खासकर कामजोंग, सेनापति और कांगपोकपी में कुकी और नगा समुदायों में हिंसक झड़पें भड़क उठीं।
एक दूसरे पर उन दोनों के हमलों में नौ लोग मारे गए। कुछ खबरों के मुताबिक दो अन्य लोगों की मौत मणिपुर- म्यांमार सीमा पर हुई है। हथियारबंद समूहों ने कई घरों को जला डाला। उस पूरे क्षेत्र में दहशत और आक्रोश का वातावरण बना हुआ है। गौरतलब है कि पहले कुकी समुदाय के कुछ संगठनों पर अलगाववादी रुझान रखने के आरोप लग चुके हैँ। अब मैतेई समुदाय से जुड़े ऐसे संगठनों ने फिर सिर उठाया है। यह ठीक है कि इन संगठनों के साथ मामूली जन समर्थन ही है। लेकिन लगातार अशांति और अस्थिरता की स्थिति में ऐसे संगठन असुरक्षा का भाव और बढ़ाते हैं, जिससे लोग उनके पाले में जाने लगते हैं। इसलिए ऐसी प्रवृत्तियों को अगंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए।
