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यह भी तानाशाही है

Dhaka, Jan 07 (ANI): Bangladesh Prime Minister Sheikh Hasina addresses the media after casting her vote for the General Elections 2024, in Dhaka on Sunday. (ANI Photo)

शेख हसीना बेहद अलोकप्रिय हैं, अदालत उन्हें कठोरतम सजा सुना चुकी है, और उनकी पार्टी आवामी लीग का सांगठिक ढांचा ढह चुका है, तो उनके बयानों से तारिक रहमान सरकार को डर क्यों लगता है?

छात्र आंदोलन के कारण बांग्लादेश से भागने की आई नौबत के दो साल पूरा होने पर पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने वर्चुअल माध्यम से पत्रकारों को संबोधित किया। ये प्रेस कांफ्रेंस इसमें कही गई बातों से ज्यादा चर्चित इसलिए हुई, क्योंकि इससे संबंधित खबर देने पर बांग्लादेश में पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। तारिक रहमान सरकार ने मीडिया और सोशल मीडिया को पहले ही आगाह कर दिया था कि शेख हसीना के बयानों को जगह देना बांग्लादेश के कानून के मुताबिक ‘अपराध’ समझा जाएगा। वहां के मेनस्ट्रीम मीडिया ने आज्ञाकारी रुख अपनाया। नतीजतन, शेख हसीना के बयानों को ब्लैकआउट कर दिया गया। बात यहीं नहीं रुकी।

शेख हसीना की कथित तानाशाही के खिलाफ युवा विद्रोह के बाद हुए चुनाव से सत्ता में आई बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सरकार ने इस घटना को भारत के साथ कूटनीतिक मुद्दा भी बना दिया। भारत सरकार से कहा गया कि वह शेख हसीना को प्रेस कांफ्रेंस की इजाजत ना दे, जिसके जवाब में भारत को इस मामले से अपने को पूरी तरह असंबंधित बताना पड़ा। सवाल यह है कि अगर शेख हसीना बेहद अलोकप्रिय हैं, अदालत उन्हें कठोरतम सजा सुना चुकी है, और उनकी पार्टी आवामी लीग का सांगठिक ढांचा ढह चुका है, तो उनके बयानों से तारिक रहमान की सरकार को डर क्यों लगता है? शेख हसीना ने दोहराया कि वे इस साल के अंत तक बांग्लादेश लौटने के इरादे पर कायम हैं, हालांकि उन्हें मालूम है कि वहां जाने पर उन्हें दंडित किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि 2024 में जिस व्यापक अशांति के कारण उनकी सरकार गिरी, वह स्वतःस्फूर्ति नहीं, बल्कि संगठित विद्रोह था, जिसका मकसद चुनावी ढांचे से बाहर जाकर “अवैध” तरीके से राजसत्ता पर कब्जा करना था। हसीना ये बातें पिछले दो साल से कहती रही हैं। बाकी उन्होंने जो कहा, राजनेता अक्सर ऐसी बातें करते हैं। आखिर इनसे बांग्लादेश की जमीनी सूरत पर क्या फर्क पड़ेगा? जब वहां सारी शक्तियां रहमान सरकार के पास हैं और प्रधानमंत्री को जन समर्थन का भरोसा है, तो उनकी सरकार एक प्रेस कांफ्रेंस से क्यों डर गई? क्या उसके ये तौर-तरीके तानाशाही नहीं हैं?

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