सुप्रीम कोर्ट के फैसले का व्यावहारिक अर्थ है कि बिना पर्यावरण मंजूरी लिए शुरू की गईं परियोजनाओं को बाद में हरी झंडी देने का आम रास्ता बंद किया गया है, लेकिन अनेक गलियां खुली रखी गई हैँ।
बिना पूर्व पर्यावरण मंजूरी के शुरू कर दी परियोजनाओं को बाद में हरी झंडी देने के लिए 2021 में जारी ऑफिस मेमोरेंडम को रद्द करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऊपर से केंद्र और कॉरपोरेट सेक्टर के लिए भले बड़ा झटका मालूम पड़े, लेकिन असल में न्यायालय ने बीच का रास्ता निकाला है। इससे सिर्फ यह होगा कि ऐसी परियोजनाओं को सामान्य आदेश के तहत पोस्ट फैक्टो मंजूरी नहीं मिलेगी, लेकिन केंद्र हर परियोजना को अलग आदेश के जरिए मंजूरी दे सकेगा। केंद्र ने 2021 में 2017 की अधिसूचना को निष्प्रभावी बनाने के लिए ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया था। 2017 की अधिसूचना के तहत पोस्ट फैक्टो (परियोजना शुरू होने के बाद) मंजूरी पर रोक लगी हुई थी।
अब कोर्ट ने फैसला दिया है कि 2021 के ऑफिस मेमोरेंडम के जरिए भविष्य में पोस्ट फैक्टो मंजूरियां नहीं दी जा सकेंगी, लेकिन अब तक दी जा चुकीं मंजूरियां वैध बनी रहेंगी। इस तरह लगभग 20,000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को पर्यावरण संरक्षण संबंधी शर्तों से मुक्त कर दिया है। भविष्य के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि सरकार चाहे तो वैधानिक अधिसूचना या माफी (एमनेस्टी) योजना के जरिए “असाधारण” मामलों में पोस्ट-फैक्टो मंजूरी दे सकेगी। कोर्ट कहा है कि असाधारण या सार्वजनिक हित में पोस्ट फैक्टो मंजूरी देना हो, तो पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम-1986 की धारा 3 के तहत विधिवत अधिसूचना/ संशोधन जारी करना अनिवार्य होगा।
यानी इस माध्यम से मंजूरी का रास्ता खुला रखा गया है। तीन जजों की बेंच ने यह व्यवस्था भी दी कि सुप्रीम कोर्ट का संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष परिस्थितियों में पोस्ट-फैक्टो मंजूरी देने का असाधारण अधिकार सुरक्षित रहेगा। तो इस फैसले का व्यावहारिक अर्थ है कि बिना पर्यावरण मंजूरी लिए शुरू कर दी गई परियोजनाओं को बाद में हरी झंडी देने का आम रास्ता बंद किया गया है, लेकिन अनेक गलियां या पगडंडियां खुली रखी गई हैँ। 2021 के ऑफिस मेमोरेंडम को पर्यावरण संरक्षण पर कॉरपोरेट हितों को तहजीह देने के सरकारी नजरिए का उदाहरण माना गया था। इस नजरिए को आगे बढ़ने के लिए केंद्र के पास आगे भी पर्याप्त अवसर बने रहेंगे।
