न्यायालय की ताजा टिप्पणियों से इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता कि आखिर कोई जन समूह आंदोलन करने पर मजबूर क्यों होता है, और अगर प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन से बात नहीं सुनी जाती, तो उसे क्या करना चाहिए?
संविधान से मिले असहमति जताने और शांतिपूर्ण प्रतिरोध के अधिकार के बारे में सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी दरअसल इस बुनियादी हक को बेहद सीमित दायरे में बांध देने वाली है। उसका संदेश है कि लोग प्रतिरोध करें, लेकिन प्रतीकात्मक तौर पर उसे जता कर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट जाएं! मुख्य निर्वाचन आयुक्त विरोधी प्रदर्शनों से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि कोई व्यक्ति, समूह या संगठन किसी निर्धारित प्रदर्शन-स्थल पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकता। अन्य समूहों को भी विरोध प्रदर्शन का समान अधिकार है, इसलिए ऐसे स्थलों के उपयोग की इजाजत सीमित अवधि के लिए ही मिलनी चाहिए।
संभवतः कोर्ट का इशारा पेपर लीक के दौरान कॉकरोच आंदोलनकारियों के जंतर-मंतर पर जम जाने की तरफ था। इसके पहले 2020 में शाहीन बाग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विरोध प्रदर्शन निर्धारित स्थानों पर ही होने चाहिए। सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकाल तक कब्जा स्वीकार्य नहीं है। जाहिरा तौर पर इन दो फैसलों के जरिए अपनी सुविधा के स्थान पर विरोध जताने और अनिश्चितकाल तक ऐसा करने के चलन को सर्वोच्च न्यायालय ने अमान्य बता दिया है। लेकिन इससे इस मूलभूत प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता कि आखिर कोई जन समूह आंदोलन करने पर मजबूर क्यों होता है, और अगर कुछ घंटों के प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन से उसकी बात नहीं सुनी जाती है, तो उसे क्या करना चाहिए?
विरोध प्रदर्शनों के दायरे को और भी ज्यादा सीमित करते हुए केरल हाई कोर्ट ने एक अन्य समस्याग्रस्त व्यवस्था दी है। मंगलवार को कोर्ट ने कहा कि धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी गतिविधियों की संवैधानिक लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है। श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय के एक मामले में उच्च न्यायालय ने कहा कि जो छात्र ऐसी गतिविधियों में शामिल होते हैं, उन्हें संबंधित संस्थान से निकाल दिया जाना चाहिए। ये बातें उच्चतर न्यायापालिका ने कही हैं, जिससे ना सिर्फ नागरिकों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा, बल्कि उनके अर्थ के विस्तार की आशा रखी जाती है। जबकि इन टिप्पणियों का मतलब अधिकार की पूरी धारणा को ही संकुचित कर देना है।
