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New Delhi, May 22 (ANI): A view of the Supreme Court of India, in New Delhi on Thursday. (ANI Photo/Rahul Singh)

संवैधानिक व्यवस्था जिन स्तंभों पर टिकी होती है, हाल के वर्षों में उन पर लगातार प्रहार हुए हैं, जिनसे उनकी कुछ ईंटें दरकी हैं। अब इस परिघटना के दायरे में सर्वोच्च न्यायपालिका भी आ गई है।  

ऐसा पहली बार हुआ, जब हजारों लोगों का जुलूस लेकर कोई पक्ष याचिका दायर करने सुप्रीम कोर्ट पहुंचा हो। दर्जन भर विपक्षी दलों के बड़े नेता एक साथ किसी याचिका पर दस्तखत करें, यह भी शायद पहला मौका ही है। इस रूप में कहा जा सकता है कि निर्वाचन आयोग के खिलाफ दायर विपक्ष की याचिका कानूनी पहल होते हुए भी, दरअसल एक राजनीतिक वक्तव्य है। विपक्ष ने सीधे प्रधान न्यायाधीश से मिल कर उन्हें याचिका सौंपने का इरादा जताया था। लेकिन जस्टिस सूर्य कांत ने मिलने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि विपक्ष को वैधानिक माध्यम अदालत की पनाह में आना चाहिए।

विपक्ष ने यह किया, लेकिन साथ ही उसने सर्वोच्च न्यायालय को सियासी कठघरे में खड़ा किया है। सामान्यतः संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका पर ऐसा घेरा मान्य परंपराओं के अनुरूप नहीं माना जाएगा। लेकिन यह सामान्य दौर नहीं है। जब जनमत का एक बड़ा हिस्सा मानने लगा हो कि सरकार संवैधानिक संस्थाओं को नियंत्रित करने की कोशिश में काफी आगे बढ़ गई है और इन संस्थाओं से इंसाफ मिलने की उम्मीद कमजोर हो चुकी है, तो उस हाल का शिकार परंपरा और मर्यादाएं ही बनती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि विपक्ष एवं सिविल सोसायटी के एक बड़े दायरे में बनी ऐसी असामान्य स्थिति के लिए न्यायपालिका को भी दोषी माना जाता है। नतीजा वे गतिविधियां हैं, जिन्हें पहले अस्वीकार्य समझा जाता था।

कुछ समय पहले बलात्कार के एक सजायाफ्ता राजनेता को जमानत दिए जाने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट के बाहर महिला संगठनों ने धरना दिया था। अब देश के लगभग तमाम विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के सामने जन लामबंदी की अपनी ताकत दिखाई है। इसके दीर्घकालिक प्रभाव और इसमें में छिपे दूरगामी संदेश को समझा जाना चाहिए। शासन के अंगों के बीच अवरोध एवं संतुलन, संस्थाओं में भरोसा, निर्वाचन की पवित्रता, और नागरिक अधिकारों का सम्मान- वो स्तंभ हैं, जिन पर संवैधानिक व्यवस्था टिकी होती है। हाल के वर्षों में इनमें से हर खंभे पर प्रहार हुआ है, जिससे उनकी कुछ ईंटें दरकी हैं। सोमवार को इस परिघटना के दायरे में सर्वोच्च न्यायपालिका भी आ गई।

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