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चरमराते शहरों का इलाज

चरमराते भारतीय शहरों को रहने योग्य बनाए रखने के लिए उचित बजट और दुरुस्त नियोजन अब अपरिहार्य हो गया है। मगर, दुर्भाग्यपूर्ण है कि ये मुद्दा हमारे नीतिकारों की चिंता के दायरे में कहीं नहीं है।

भारतीय शहरों की मौजूदा अवस्था से विश्व बैंक चिंतित है। उसने आगाह किया है कि जहां शहर फैल रहे हैं, वहीं जलवायु परिवर्तन के कारण उनके सामने गंभीर चुनौतियां पेश आ रही हैं। ऐसे में शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त करना अति आवश्यक हो गया है। अपनी एक ताजा रिपोर्ट में विश्व बैंक ने अनुमान लगाया है कि भारत में शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर को बदलते मौसम के अनुरूप ढालने के लिए 2050 तक 2.4 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की जरूरत होगी। विश्व बैंक ने ध्यान दिलाया है कि 2050 तक भारतीय शहरों में रहने वाले लोगों की संखअया 95 करोड़ से ज्यादा हो जाएगी।

इस बीच बारिश, गर्म हवाओं और समुद्री जलस्तर में बदलाव की घटनाएं और भी अधिक अनियमित हो जाएंगी। उसे देखते हुए यह अनिवार्य हो गया है कि आवास निर्माण, परिवहन, जल एवं कचरा प्रबंधन आदि में बड़े पैमाने पर निवेश किया जाए। हकीकत यह है कि जिन चुनौतियां का विश्व बैंक ने उल्लेख किया है, वे आज भी कम गंभीर नहीं हैं। भारत का शायद ही कोई शहर हो, जहां बरसात के मौसम जल-भराव के कारण मुश्किलों का सामना लोगों को ना करना पड़ता हो। फिर तमाम शहरों के बड़े हिस्से झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों से भरे पड़े हैं और स्वच्छता हर जगह एक बड़ी समस्या बनी हुई है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल शहरी जल-भराव के कारण हर साल भारत को चार बिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है।

शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर को सुधारने के कदम नहीं उठाए गए, तो 2030 तक ये वार्षिक नुकसान पांच बिलियन और 2050 तक 30 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा। फिर नगरवासियों को हो रही दिक्कतों का भी मसला है। इसलिए इस समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। विश्व बैंक ने कहा है कि भारत अपने जीडीपी का सिर्फ 0.7 प्रतिशत शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करता है, जो वैश्विक मानक से बहुत कम है। संदेश यह है कि चरमराते भारतीय शहरों को रहने योग्य बनाए रखने के लिए उचित बजट और दुरुस्त नियोजन अब अपरिहार्य हो गया है। मगर, दुर्भाग्यपूर्ण है कि ये मुद्दा हमारे नीतिकारों की चिंता के दायरे में कहीं नहीं है।

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