संयुक्त राष्ट्र की यह पहली ऐसी रिपोर्ट है, जिसमें इतनी अंधकारमय तस्वीर का वर्णन है। जलवायु विशेषज्ञों ने कहा है कि नेपाल में जो हुआ, वह दुनिया के संभावित भविष्य की एक मिसाल भर है।
ग्लेशियर गिरने से नेपाल में आई तबाही की दर्दनाक कहानियों के बीच संयुक्त राष्ट्र ने यह भयानक आकलन दुनिया के सामने रखा है कि ग्लोबल वॉर्मिंग से गंभीरतम किस्म की क्षतियों को रोकने का अवसर धरती ने गंवा दिया है। अब चुनौती इस पर विचार करने की है कि बढ़ चुके तापमान को कैसे फिर से खतरे की सीमा से नीचे लाया जाए। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने अपनी ताजा रिपोर्ट में बताया है कि 2015 की पेरिस जलवायु संधि में जिस तापमान को लेकर चेताया गया था, वह सीमा जल्द ही पार होने वाली है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि तब दी गई चेतावनी पर शासकों ने ध्यान नहीं दिया। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जारी रहा। नतीजतन, धरती का तापमान खतरनाक सीमा तक पहुंच गया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक यह संयुक्त राष्ट्र की पहली ऐसी रिपोर्ट है, जिसमें इतनी अंधकारमय तस्वीर का वर्णन है। जलवायु विशेषज्ञों ने कहा है कि नेपाल में जो हुआ, वह दुनिया के संभावित भविष्य की एक मिसाल भर है। जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर में ग्लेशियर पिघल रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इसकी सबसे बड़ी मार उन जन समूहों पर पड़ रही है, ग्लोबल वॉर्मिंग में जिनकी नगण्य भूमिका है। ग्रीनहाउस गैसों के वैश्विक उत्सर्जन में नेपाल का हिस्सा सिर्फ 0.1 प्रतिशत है। प्रति व्यक्ति ग्रीनहाउस गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन अमेरिका और अन्य विकसित देशों में होता है। लेकिन जलवायु परिवर्तन रोकने की अपनी जिम्मेदारी से वे देश अब पूरा मुंह मोड़ चुके हैं।
डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में पर्यावरण संरक्षण के बजट में भारी कटौती हुई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भू-स्खलन सहित अन्य प्राकृतिक खतरों की निगरानी के लिए नेपाल को अमेरिका से जो मदद मिलती थी, ट्रंप के कार्यकाल में उसे रोक दिया गया। आपदा आने के बाद सवाल उठा है कि क्या अगर वो कार्यक्रम जारी रहता, तो तबाही से पहले एहतियाती इंतजामों का मौका मिल सकता था? बहरहाल, विकसित दुनिया अभी ऐसे सवालों को ठेंगे पर रख रही है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन जनित प्राकृतिक आपदाओं की आशंका को लेकर लाचारी का भाव बढ़ा है, तो वह लाजिमी ही है।
