भारत के अभिन्न अंगों को आधिकारिक भारतीय मानचित्र के अनुसार ही दिखाया जाना चाहिए, इस रुख से देश को आश्वस्त करने के बाद सरकार को यह बताना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र इस भावना के खिलाफ क्यों गया?
सोलहवीं सदी से इस्तेमाल हो रहे मर्केटर मानचित्र को बदलने के प्रस्ताव का संयुक्त राष्ट्र में समर्थन कर भारत ने उचित रुख अपनाया। पुराना नक्शा जाहिरा तौर पर औपनिवेशिक नजरिए से तैयार किया गया था, जिसे बदलना विश्व बहुमत की जीत समझा जाएगा। यह बात संयुक्त राष्ट्र में हुए मतदान में भी जाहिर हुई, जहां सिर्फ अमेरिका ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। आम तौर पर उसके पीछे चलने वाले छह देशों ने तटस्थ रुख अपनाया, जबकि भारत सहित 164 देशों ने मानचित्र बदलने का समर्थन किया। अतः बाद में जो हुआ, उसे नए नक्शे के समर्थन के भारत सरकार के फैसले से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह बेशक गहरे अफसोस की बात है कि बाद में संयुक्त राष्ट्र ने जो विश्व मानचित्र जारी किया, उसमें भारत की प्रादेशिक अखंडता का ख्याल नहीं रखा गया।
इसमें जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों को पाकिस्तान और चीन के साथ विवादित हिस्से के रूप में दिखाया गया है। उचित ही भारत सरकार ने उस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उसने स्पष्ट कहा है कि ऐसा कोई भी चित्रण, जो आधिकारिक भारतीय नक्शे से मेल नहीं खाता, वह पूर्णतः अमान्य और अस्वीकार्य है। भारतीय विदेश मंत्रालय दो-टूक कहा है कि भारत की प्रादेशिक अखंडता और संप्रभुता पर कोई बातचीत नहीं हो सकती। भारत के अभिन्न अंगों को भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुसार ही दिखाया जाना चाहिए।
बहरहाल, इस रुख से देश को आश्वस्त करने के बाद भारत सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र इस भावना के खिलाफ क्यों गया? भारत के जिन इलाकों पर पाकिस्तान और चीन की निगाहें रही हैं, आखिर उनके बारे में विश्व समुदाय का बहुमत क्या सोचता है? हालांकि किसी बाहरी ताकत की सोच अपनी प्रादेशिक अखंडता की रक्षा करने के भारतीय आवाम के इरादे को नहीं डिगा सकती, फिर भी दुनिया में सम्मानित राष्ट्र के रूप खड़े रहने के लिए अपने पक्ष को विश्व जनमत की स्वीकृति दिलाना भी अनिवार्य है। इस बिंदु पर दुनिया में भारत की क्या स्थिति है, इस बारे में देशवासियों को भरोसे में लिया जाना चाहिए।
