सैन्य विकल्प समाप्त हो जाने के बाद अमेरिका अब आर्थिक दबाव के जरिए वह हासिल करने की कोशिश कर रहा है, जो सैन्य बल से संभव नहीं हुआ। लेकिन आर्थिक कदम भी दंत-विहीन ही हैं।
अमेरिका ने ईरान को दुनिया में “पराया” बना देने के बड़े इरादे के साथ ‘ऑपरेशन इकॉनमिक आउटकास्ट’ का एलान किया। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने धमकी दी कि अब ईरान से किसी भी प्रकार का आर्थिक संबंध रखने वाले देश और कंपनियों को डॉलर सिस्टम से बाहर कर दिया जाएगा। लेकिन जब प्रतिबंधों की सूची जारी की गई, तो ऐसा नहीं लगा कि अमेरिका सचमुच अपने एलान को हकीकत में बदलने में सक्षम है। इसमें भारत की चार कंपनियों सहित लगभग 60 व्यक्तियों, संस्थाओं और कंपनियों को शामिल किया गया, लेकिन चीन की किसी वित्तीय संस्था को निशाना नहीं बनाया गया। इस बारे में पूछने पर बेसेंट ने कहा- “वैश्विक वित्तीय प्रणाली को मैं क्यों उड़ा डालना चाहूंगा?”
मतलब साफ है। अमेरिका की राय है कि चीनी बैंकों पर प्रतिबंध लगाने से पूरी वित्तीय प्रणाली संकटग्रस्त हो सकती है। जबकि चीन ही ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है। वह ईरान में बड़ा निवेशक भी है। अतः चीन को रोके बिना अमेरिकी प्रतिबंध दिखावटी दांत बन कर रह जाएंगे। चीनी विदेश मंत्रालय ने ताजा अमेरिकी प्रतिबंध को यह कहते हुए ठुकरा दिया है कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून एवं संयुक्त राष्ट्र के दायरे से बाहर है। उसने कहा कि चीन अपने हितों की मजबूती से रक्षा करेगा। तो फिर अमेरिकी प्रतिबंध से कौन प्रभावित होगा? रूस पहले से ही सबसे अत्यधिक प्रतिबंधित देश है, इसलिए उस पर नई पाबंदियों का नगण्य असर होना है। दरअसल, प्रतिबंधों की घोषणा के बाद रूस ने ईरान से 25 बिलियन डॉलर का परमाणु समझौता करने का एलान कर दिया।
ऐसे में स्पष्ट है कि अमेरिकी कदम का दबाव सिर्फ खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका/ इजराइल के कुछ सहयोगी देश ही महसूस करेंगे, जो ईरान के लिए किसी गंभीर चिंता का विषय नहीं है। इसीलिए विश्लेषकों ये राय जताई है कि “ऑपरेशन इकॉनमिक आउटकास्ट” असल में यह स्वीकारोक्ति है कि अमेरिका के पास सैन्य विकल्प समाप्त हो चुके हैं। इसलिए अमेरिका अब आर्थिक दबाव के जरिए वह हासिल करने की कोशिश कर रहा है, जो सैन्य बल से संभव नहीं हुआ। लेकिन आर्थिक कदम भी दंत-विहीन ही हैं।
