मुमकिन है कि सरकार की नजर में कोई मांग नाजायज हो। फिर भी क्या यह लोकतांत्रिक तकाजा नहीं है कि वह संबंधित समूह से संवाद करे और तर्क-वितर्क से किसी सहमति पर पहुंचने का प्रयास करे?
दिल्ली के जंतर-मंतर से सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जबरन हटा कर अस्पताल में भर्ती करवाने की पुलिस कार्रवाई से फिर वही संदेश गया है कि वर्तमान सरकार के तहत अपनी शिकायत या मांग रखने की न्यूनतम गुंजाइश भी नहीं बची है। भूख हड़ताल का तरीका उचित है या नहीं अथवा वांगचुक एवं कॉकरोच जनता पार्टी की मांग कितनी उचित है, ऐसे प्रश्न फिलहाल पृष्ठभूमि में चले गए हैँ। उनकी जगह इस बुनियादी सवाल ने ली है कि अपने को लोकतंत्र कहने वाली व्यवस्था में कोई समूह अपनी मांग रख रहा हो, तो उसके प्रति सरकार को क्या नजरिया अपनाना चाहिए?
मुमकिन है कि सरकार की नजर में वो मांग जायज नहीं हो। फिर भी क्या यह लोकतांत्रिक तकाजा नहीं है कि वह संबंधित समूह से संवाद करे और तर्क-वितर्क से उसके साथ किसी सहमति पर पहुंचने का प्रयास करे? कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म व्यवस्था के शिकार नौजवानों के प्रति उच्च पदस्थ शख्सियतों की हेयदृष्टि का परिणाम है। विभिन्न स्तरों पर परीक्षा व्यवस्था में लगातार उजागर हुई गड़बड़ियों और कथित भ्रष्टाचार से ऊबे छात्र उसका मुख्य समर्थन आधार बने हैं। उनकी ही मांगों पर जोर डालने के लिए वांगचुक 23 दिन से अनशन पर बैठे हैं। इस दरम्यान नरेंद्र मोदी सरकार के किसी मंत्री या अधिकारी ने जंतर-मंतर पर इकट्ठा लोगों से संवाद की जरूरत नहीं समझी।
अब चूंकि संसद का सत्र शुरू हो रहा है और इसके पहले दिन वांगचुक और उनके साथियों ने संसद भवन की तरफ कूच करने का इरादा जताया था, तो सरकार ने अपना रुख और सख्त कर लिया है। मगर यह नजरिया लोकतंत्र में मौजूद हर उस सेफ्टी वॉल्व को बंद करता जा रहा है, जिनके जरिए असंतुष्ट समूहों का गुबार निकलते रहने से व्यवस्था स्थिर बनी रहती है। सरकार के लिए यह समझने का पहलू है कि बात ना करने या शिकायतों को नजरअंदाज करने से असंतोष का समाधान नहीं हो जाता। बल्कि उससे जन मानस में एक किस्म की टूटन होती है, जो व्यवस्था में उनके भरोसे को कम करती है। “कॉकरोचों” की बात ना सुनकर सरकार इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है।
