जिस समय देश में ‘विश्व गुरु’ बनने की खुशफहमी का आलम था, असल में भारत सरकार अवसरों का लाभ उठाने की कारगर रणनीति बनाने में नाकाम रही। दो बड़े थिंक टैंक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं।
दो थिंक टैंक इस समान निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि 2018 के बाद वैश्विक समीकरणों में शुरू हुए तेज बदलाव से जो अवसर सामने आया, भारत उसका लाभ उठाने में विफल रहा। दरअसल, यह उस दौर की कथा है, जिसमें भारत के ‘विश्व गुरु’ बनने की कहानियों पर करोड़ों देशवासी यकीन किए हुए थे। लेकिन जिस समय ऐसी खुशफहमी का आलम था, असल में भारत सरकार अवसरों का लाभ उठाने की कारगर रणनीति बनाने में नाकाम रही। न्यूयॉर्क स्थित थिंक टैंक रोडियम ग्रुप ने ‘क्या भारत अंततः अपनी मैनुफैक्चरिंग महत्त्वाकांक्षाओं को हासिल कर सकेगा’- शीर्षक से जारी अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि 2018 में जब अमेरिका और चीन में व्यापार जंग शुरू हुई, तो यह आम धारणा बनी कि चूंकि कंपनियां अपना कारोबार चीन से निकालकर दूसरे देशों में ले जाएंगी, तो भारत को इसका सबसे ज्यादा फायदा होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
वियतनाम और मेक्सिको ने इस मामले में कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है। अमेरिका को चीन के निर्यात में आई गिरावट से खाली हुई जगह को उन्होंने प्रभावी ढंग से भरा। इससे इन देशों के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में ज्यादा मूल्य (वैल्यू) जुड़ा, जबकि भारत इस मामले में काफी पीछे रह गया है। रणनीतिक मामलों में ऐसे ही निष्कर्ष पर ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक लोवी इंस्टीट्यूट पहुंचा है। उसके ‘एशिया पावर इंडेक्स’ के मुताबिक भारत अपनी विशाल क्षमताओं और संसाधनों के बावजूद एशिया में प्रभावशाली शक्ति या क्षेत्रीय “एंकर” (स्थिरता प्रदान करने वाली प्रमुख ताकत) नहीं बन पा रहा है।
इंस्टीट्यूट के मुताबिक भारत के पास जितनी क्षमता, जनसंख्या, और संसाधन हैं, उनकी तुलना में उसका वास्तविक क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बहुत कम है। भारत का क्षेत्रीय रक्षा गठबंधनों और व्यापारिक साझेदारियों में प्रभाव अन्य प्रमुख शक्तियों की तुलना में सीमित है, जिससे यह अपनी क्षमता का पूरा लाभ नहीं उठा पाया है। चीन से पश्चिम की प्रतिस्पर्धा के मद्देनजर भारत से हमदर्दी रखने वाली विदेशी संस्थाएं ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचती हैं, तो उस पर भारतवासियों को ध्यान देना चाहिए। जब जवाबदेही का मुद्दा उठा है, इन नाकामियों के लिए कौन उत्तरदायी है, ये सवाल भी जरूर पूछा जाना चाहिए।
