गरीबी में भारी गिरावट का दावा करने वाली विश्व बैंक की रिपोर्ट आने के सिर्फ दो दिन पहले केपीएमजी-इंडिया ने बताया था कि भारत की 35 फीसदी आबादी कुपोषण या खाद्य असुरक्षा से ग्रस्त है।
विश्व बैंक के मुताबिक भारत की अब सिर्फ 2.6 फीसदी आबादी चरम गरीबी की अवस्था में है। विश्व बैंक की चरम गरीबी का फॉर्मूला 2021 के कीमतों के मुताबिक क्रय शक्ति समतुल्यता (पीपीपी) पर प्रति दिन प्रति व्यक्ति खर्च क्षमता तीन डॉलर यानी लगभग 63 रुपये है। बैंक ने कहा कि 2011-23 के बीच भारत में 49 करोड़ 60 लाख लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर लाया गया। अब इस रेखा के नीचे भारत में अब केवल लगभग 14 प्रतिशत आबादी है। बैंक की गरीबी रेखा प्रति दिन पीपीपी 4.2 डॉलर यानी लगभग 87 रुपये है।
यानी मासिक तकरीबन 2,700 रुपये। घर में चार व्यक्ति हों, तो जिस परिवार की मासिक आय 10,800 रुपये है, विश्व बैंक की परिभाषा के मुताबिक वह गरीब नहीं है। अब इस रकम में कोई परिवार क्या उपभोग करेगा और उसका जीवन स्तर कैसा होगा, यह अंदाजा लगाया जा सकता है। इस रूप में सोचते हुए इस विडंबना को बेहतर समझा जा सकता है कि विश्व बैंक की ये रिपोर्ट आने के सिर्फ दो दिन पहले मार्केटिंग एजेंसी केपीएमजी- इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि भारत की 35.5 प्रतिशत आबादी यानी लगभग 52 करोड़ लोगों को क्रय शक्ति की कमी के कारण स्वस्थ और पौष्टिक आहार नहीं मिल पा रहा है। केपीएमजी ने कहा कि भारत के पास अनाज की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद देश की एक तिहाई से ज्यादा आबादी कुपोषण या खाद्य असुरक्षा से ग्रस्त है।
तो ऐसे परस्पर विरोधी आंकड़ों को देख कर आम इनसान तो दूर, अर्थव्यवस्था को समझने वाले पढ़े-लिखे लोगों का भी दिमाग चकरा जाए, तो उसे स्वाभाविक ही माना जाएगा। और ऐसा नहीं है कि ऐसे अंतर्विरोध नासमझी या आंकड़ों के अभाव के कारण पैदा होते हैं। अब इस बारे में पर्याप्त अध्ययन है, जिसके मुताबिक चालू नीतियों और जारी आर्थिक सोच को वैध एवं आम जन में स्वीकार्य बनाने के लिए आंकड़ों की व्याख्या के तरीके गुजरे दशकों में इज़ाद किए गए। और जब मकसद जमीनी हकीकत को समझना नहीं, बल्कि नैटेरिव गढ़ना हो, तो फिर बात ही पलट जाती है। लेकिन नैरेटिव समस्या का समाधान नहीं हैं।
