पुलिस कार्रवाइयों में मानव अधिकारों की अनदेखी बढ़ती चली गई है। गाहे-ब-गाहे ऐसी धारणा बनी है कि पुलिसकर्मी सरकारी नीति के तहत या सत्ताधारी नेताओं के निर्देश पर नागरिक अधिकारों की अनदेखी कर रहे हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व ने परीक्षा व्यवस्था की गड़बड़ियों की जवाबदेही तय करने के लिए आंदोलन चलाया, लेकिन उसी आंदोलन के दौरान ही पुलिस जवाबदेही का जो सवाल खड़ा हुआ, उसे उठाने की जिम्मेदारी उसने नहीं निभाई। यह स्वागतयोग्य है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ये दायित्व उठाया है। इससे संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव का नया मुद्दा भी उभरा है। गांधी ने रविवार को गृह मंत्री अमित शाह को लिखे पत्र में दो ठोस सवाल पूछेः क्या 20 जुलाई को छात्रों के संसद मार्च के दौरान उन पर पैलेट गन सहित जानलेवा ताकत के इस्तेमाल की मंजूरी आपने दी और अगर नहीं, तो फिर किसने दी? सादी पोशाक में जो लोग लाठियों से छात्रों को पीटते देखे गए, वे पुलिसकर्मी थे या स्वयंसेवक, और उनकी तैनाती का आदेश किसने दिया?
देश के जनमत का एक बड़ा हिस्सा राहुल गांधी की इस टिप्पणी से सहमत होगा कि ऐसी हिंसा से हर कायदा नष्ट होता है और इस घटना ने देशवासियों में आक्रोश भरा है। आशा है, गृह मंत्री नेता विपक्ष को जवाबी पत्र लिखने अथवा संसद में इन प्रश्नों का उत्तर देने की अपनी जवाबदेही स्वीकार करेंगे। इसकी आवश्यकता इसलिए भी है, क्योंकि हाल के वर्षों में पुलिस कार्रवाइयों के दौरान मानव अधिकारों के प्रति सम्मान का भाव लगातार घटता चला गया है। गाहे-ब-गाहे ऐसी धारणा बनी है कि पुलिसकर्मी सरकारी नीति के तहत या उच्च पदस्थ राजनेताओं के निर्देश पर नागरिक अधिकारों की अनदेखी कर रहे हैं।
20 जुलाई को पुलिसकर्मियों ने देश की राजधानी में, विश्व मीडिया के सामने, उच्च-मध्यम एवं मध्य वर्ग से आए ज़ेन-जी प्रदर्शनकारियों पर वैसी ही अमान्य कार्रवाइयां कीं। चूंकि दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आती है, इसलिए यह अपेक्षित है कि अमित शाह इस बारे में स्थिति स्पष्ट करें। अगर पुलिसकर्मियों ने खुद अति-उत्साह दिखाया, तो उनके खिलाफ तुरंत उचित कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए। अगर निर्णय राजनीतिक स्तर पर लिया गया, तो गृह मंत्री को अपना उत्तरदायित्व स्वीकार करना चाहिए। जवाबदेही का सवाल धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ खत्म नहीं हो गया है।
