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जब सुना ही ना जाए!

कहा जाता है कि कई बार सिर्फ बात सुन लेने से बात बनने की राह निकल आती है। वरना, बातें मन में गुबार की तरह इकट्ठी होती जाती हैं और इनका कब, किस रूप में विस्फोट होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन होता है।

मणिपुर के निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की मनोदशा का अंदाजा लगाया जा सकता है। खास बात यह कि इन प्रतिनिधियों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेता भी शामिल हैं। डेढ़ महीने से हिंसा और शब्दशः आग से झुलस रहे इस राज्य के प्रतिनिधि अपनी व्यथा प्रधानमंत्री को बताने नई दिल्ली आए थे। यह बिल्कुल ही अविश्वसनीय महसूस होता है कि देश का एक राज्य अभूतपूर्व सामुदायिक हिंसा के लहूलुहान है और वहां के जन प्रतिनिधियों से मिलने भर का समय प्रधानमंत्री ना निकाल पाएं। कहा जाता है कि कई बार सिर्फ बात सुन लेने से बात बनने की राह निकल आती है। वरना, बातें मन में गुबार की तरह इकट्ठी होती जाती हैं और इनका कब, किस रूप में विस्फोट होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन होता है। चूंकि प्रधानमंत्री से समय नहीं मिला, तो मणिपुर के नेता विभिन्न विपक्षी दलों के कार्यालयों में जाकर उन दलों के नेताओं से मिले। फिर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से उनमें से कुछ की मुलाकात हुई। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका यात्रा पर रवाना हो गए।

अनुमान लगाया जा सकता है कि मणिपुर के नेताओं के पहले से व्यथित मन पर इससे कैसा घाव लगा होगा। अब मणिपुर भाजपा के नौ विधायकों ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि राज्य की भाजपा सरकार लोगों का भरोसा खो चुकी है। यह बात पहले अन्य दलों के नेता और कुकी समुदाय के कार्यकर्ता कह रहे थे। क्या ऐसी परिस्थितयों भाजपा को अपने मुख्यमंत्री को इस्तीफा देने के लिए नहीं कहना चाहिए? लेकिन बात घूम-फिर कर वहीं आ जाती है कि “भाजपा शासन में इस्तीफे नहीं होते।” स्पष्टतः यह इस पार्टी की जिद और एक सीमा तक अहंकार की झलक है। जो पार्टी पहले व्यक्ति से ऊपर संगठन और संगठन से ऊपर देश के होने की बात कहती थी, वह आज सबको यह संदेश देती लग रही है कि उसके पास वह ताकत है, जिसके सामने सबको नत-मस्तक रहना चाहिए। लेकिन सत्ताधारी का ऐसा रवैया समाज में ऐसे गतिरोध पैदा करता जाता है, जिसका नतीजा कभी अच्छा नहीं होता। इसलिए भाजपा को अपने इस नजरिए में तुरंत बदलाव लाना चाहिए।

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