संसदीय परंपरा के तहत निचले सदन में विपक्ष के नेता को ‘प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग’ कहा जाता है। इस रूप में कई राजनीति-शास्त्री इसे प्रधानमंत्री के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण पद बताते हैं। इस मान्यता के पीछे प्रमुख तर्क है कि नेता विपक्ष सरकार से असहमत पूरे जनमत की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। लोकतांत्रिक अपेक्षा यह है कि इन भावनाओं की भी कद्र की जाए। तो कहा जाता है कि पक्ष- विपक्ष दोनों लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के अंग हैं। लेकिन यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेता विपक्ष सवाल पूछते हुए पत्र लिखें, और गृह मंत्री उसकी पावती भेजने की जरूरत भी ना समझें। लो
कसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 25 जुलाई को भेजे पत्र में अमित शाह से पूछा था कि 20 जुलाई को छात्र- नौजवानों के ‘संसद मार्च’ के दौरान घातक हथियारों के इस्तेमाल तथा सादी पोशाक में ‘सुरक्षाकर्मियों’ की तैनाती का आदेश किसने दिया? 29 जुलाई को गांधी ने बताया कि जवाब तो दूर, पत्र का एक्नॉलेजटमेंट तक उन्हें नहीं मिला है। गांधी ने वही प्रश्न लोकसभा में पूछे, लेकिन वे शोरगुल और हंगामे के बीच कहीं दब गए। गांधी का कहना है कि चूंकि दिल्ली पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स और सीआरपीएफ (जिन एजेंसियों की तैनाती थी) केंद्रीय गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करते हैं, अतः दिल्ली में जो हुआ- अगर वह शाह की जानकारी में हुआ तो सारी जवाबदेही उनकी बनती है।
अगर प्रदर्शनकारियों पर ‘क्रूर हमले’ की जानकारी उन्हें नहीं थी, तो शाह अयोग्य गृह मंत्री माने जाएंगे। इन दोनों ही स्थितियों में अमित शाह का गृह मंत्री बने रहना अस्वीकार्य हो गया है। राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि अमित शाह की जवाबदेही का सवाल फिलहाल कांग्रेस का मुख्य मुद्दा है। इस तरह संसद और उसके बाहर टकराव एक नया फ्लैश प्वाइंट तैयार हो गया है। ऐसा संभवतः नहीं होता, अगर शाह विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर देते और दिल्ली की घटनाओं की निष्पक्ष जांच का एलान कर देते। मगर ऐसी बातों की अपेक्षा अब सदिच्छा भर मालूम पड़ती है। इसलिए सरकार के रोड-रोलर रुख ने संवाद से समाधान निकालने के सिस्टम को ही गतिरुद्ध कर रखा है।
